Zamiyat Youths Club

मानवसेवा अल्लाह की एक अज़ीम इबादत और उसकी रज़ा हासिल करने का बेहतरीन ज़रिया है : मौलाना मुहम्मद क़ासिम साहब क़ासमी*






*निस्वार्थ भाव से सम्पूर्ण मानवजाति की सेवा के संकल्प के साथ प्रवेश एवं द्वितीय कैंप का समापन*


शैखुलहिंद ट्रेनिंग सेंटर जामिया इस्लामिया महमूदिया बेलौड़ी बनारस में चल रहे भारत स्काउट एंड गाइड जमीयत यूथ क्लब के प्रवेश एवं द्वितीय कैंप का आज पारंपरिक रूप से राष्ट्रगान एवं विसर्जन से समापन हुआ। कार्यक्रम में *मुख्य अतिथि के रूप में जमीयत उलमा ए बनारस के उपाध्यक्ष मौलाना मुहम्मद क़ासिम साहब क़ासमी* तशरीफ लाए। आपने बच्चों को संबोधित करते हुए कहा कि मानवता के आधार पर मानवजाति की सेवा करना बहुत बड़ी इबादत है और अल्लाह की रज़ा हासिल करने के बेहतरीन ज़रिया है। हमे खुद को अपने घर वालो के लिए, अपने समाज के लिए एवं अपने राष्ट्र के लिए उपयोगी बनाना है। हम दूसरों के लिए उपयोगी तब ही बन सकते हैं जब हम खुद के लिए उपयोगी हो और मानसिक एवं शारीरिक रूप से स्वास्थ्य हों। और ये चीज़ बेगैर मेहनत के नही आ सकती। इसलिए आपके टीचर आपको जो बताया है उसपर अमल करें और जमीयत यूथ क्लब की तरफ से जब भी आपको आवाज़ दी जाए आप मैदान में मौजूद हों।

*मौलाना अम्मार यासिर साहब नोमानी सेक्रेटरी जमीयत उलमा दक्षिणी बनारस* ने बच्चों से कहा कि सभी लोग अपने एक डायरी बनाए एवं रोजाना कम से कम तीन ऐसे नेक काम करें जो उस डायरी में लिखें।

*मुफ्ती अबू स्वालेह साहब क़ासमी सेक्रेटरी जमीयत उलमा बनारस* ने कहा कि जमीयत यूथ क्लब का एक बड़ा उद्देश्य चरित्र निर्माण भी है लिहाज़ा हम ये तय करें कि अपने रोज़ाना के कामों को सुन्नत तरीक़े पर अदा करेंगे।

*जमीयत यूथ क्लब बनारस के कनवीनर जनाब मुहम्मद रिज़वान साहब* ने अपने संबोधन में बच्चों से कहा कि जमीयत यूथ की प्रतिष्ठा अब आपसे जुड़ी हुई है, हमारा कोई भी काम ऐसा न हो हमारी प्रतिष्ठा को धूमिल करे। अंत में कैंप के सफल आयोजन के लिए *शिविर संचालक जमीयत यूथ क्लब के एडीओसी जनाब मास्टर Rover Wazaman साहब और मौलाना Noorul Bashar साहब* का शुक्रिया अदा किया जिनकी दिनरात की मेहनत से ये कैंप सफल हुआ। इसी तरह से क्वार्टर मास्टर की भूमिका निभाने वाले जनाब बशीर अहमद साहब, जावेद भाई, सईद अख्तर, खुर्शीद जमाल एवं मोहसिन का भी बहुत बहुत शुक्रिया जिन्होंने अपना 3 दिन बच्चों की सेवा में लगा दिया। मदरसा के प्रबंध समिति के सभी सदस्यों का एवं मदरसों के समस्त स्टाफ का शुक्रिया जिनके सहयोग से कैंप का आयोजन हो पाया।

आज के इस समापन समारोह में उपर्युक्त व्यक्तियों के अतिरिक्त जमीयत यूथ क्लब बनारस के वरिष्ठ सदस्य हाफ़िज़ अबू हम्ज़ा साहब और मदरसे के अन्य गणमान्य शिक्षकगण उपस्थित थे।


Jamiyat Ulema e hind Darul uloom dewband in India



जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी के निमंत्रण पर देश के बुद्धिजीवियों, राजनीतिक और धार्मिक नेताओं की एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी आयोजित









नई दिल्ली, 19 अगस्त 2023। “वर्तमान परिस्थिति पर आपसी संवाद“ के शीर्षक से शनिवार को एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी जमीअत उलेमा हिन्द, नई दिल्ली के प्रधान कार्यालय के मदनी हॉल में आयोजित की गई, जिसमें समाज के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी हस्तियों, अर्थशास्त्रियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, विचारकों और प्रोफेसरों ने भाग लिया। संगोष्ठी में देश के सामने मौजूद साम्प्रदायिकता की चुनौती, सामाजिक ताने-बाने के बिखराव और इसके रोकथाम के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा की गई और जमीनी स्तर पर काम करने और संवाद की आवश्यकता पर सहमति व्यक्त की गई। सभी बुद्धिजीवियों ने माना कि साम्प्रदायिकता इस देश के स्वभाव से मेल नहीं खाती और न ही मातृभूमि के अधिकांश लोग ऐसी सोच के पक्षधर हैं, लेकिन ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जो लोग सकारात्मक सोच के समर्थक हैं, उन्होंने या तो खामोशी की चादर ओढ़ ली है या उनकी बात समाज के अंतिम भाग तक नहीं पहुंच पा रही है, जिसकी वजह से जो लोग देश के सामाजिक ढांचे को बदल देना चाहते हैं या नफरत की दीवार खड़ी करके अपनी राष्ट्रविरोधी विचारधारा को सफल बनाना चाहते हैं, वह जाहिरी तौर पर हावी होते नजर आ रहे हैं। हालांकि यह वास्तविकता नहीं है। इसलिए समाज के बहुसंख्यक वर्ग को मौन रहने के बजाय कर्मक्षेत्र में आना होगा और भारत की महानता एवं उसके स्वाभाविक अस्तित्व को बचाने के लिए एकजुट एवं सर्वसम्मत लड़ाई लड़नी होगी।


अपने उद्घाटन भाषण में जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष और कार्यक्रम के सूत्रधार मौलाना महमूद असद मदनी ने बुद्धिजीवियों का स्वागत करते हुए सवाल किया कि ऐसी स्थिति में जब देश के एक बड़े अल्पसंख्यक वर्ग को उसके धर्म और आस्था की वजह से निराश करने या अलग-थलग करने की कोशिश की जा रही है, हमें इसके समाधान के लिए क्या आवश्यक कदम उठाने चाहिएं? मौलाना मदनी ने कहा कि जमीअत उलमा-ए-हिंद के बुजुर्गों ने गत सौ वर्षों से आधिकारिक तौर पर और दो  सौ  वर्षों से अनौपचारिक रूप से देश को एकजुट करने की कोशिश की और देश की महानता को अपनी जान से ज्यादा प्रिय बनाया। जब देश के विभाजन की नींव रखी गई तो हमारे पूर्वजों ने अपनों से मुकाबला किया। देश के लिए अपमान सहा और आजादी के बाद राष्ट्रीय एकता के लिए अपने बलिदानों की अमिट छाप छोड़ी और तमाम कठिनाइयों के बावजूद हम आज तक अपनी डगर से हटे नहीं हैं। वर्तमान स्थिति में भी हम संवाद के पक्ष में हैं, हमारी राय है कि सबके साथ संवाद होना चाहिए और एक ऐसा संयुक्त अभियान चलना चाहिए कि देश का हर धागा एक-दूसरे से जुड़ जाए।

सुप्रसिद्ध सामाजिक विचारक विजय प्रताप ने अपने विचार व्यक्त करते हुए आपसी संवाद पर जोर देते हुए कहा कि जमीअत उलमा-ए-हिंद ने जो बलिदान दिए हैं, वह व्यर्थ नहीं गए। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि भारत के विभाजन के अत्यंत साम्प्रदायिक वातावरण के बावजूद देश का संविधान धर्मनिरपेक्ष आधार पर बनाया गया। इस्लामिक शिक्षाओं और विचारों का जो विकास भारत में हुआ, बड़े-बड़े इस्लामी विचारक यहां जन्मे, जिनके उल्लेख के बिना वैश्विक स्तर पर इस्लाम का जिक्र अधूरा और अपूर्ण है। इसके अलावा देश के विकास के जितने विषय हैं, उनमें मुसलमानों की देश के अन्य लोगों की तरह बड़ी भूमिका है। इसलिए हमें वर्तमान परिस्थितियों से निराश होने की जरूरत नहीं है, हर समुदाय के साथ ऐसी स्थितियां होती हैं और जो समुदाय जागरूकता का परिचय देता है, वह हालात से निपटने में सक्षम होता है।

अर्थशास्त्री प्रो. अरुण कुमार ने कहा कि देश में आर्थिक असमानता के कारण दक्षिणपंथी तत्वों को अपने विचारों को बढ़ावा देने का मौका मिल जाता है। उन्होंने कहा कि सरकार ने जो दावा किया है कि 13 करोड़ से अधिक लोग गरीबी रेखा से ऊपर उठ गए हैं, यह पूरी तरह से निराधार है। असंगठित क्षेत्र के 94 प्रतिशत से अधिक लोग दस हजार से कम मासिक वेतन पाते हैं, जो गरीबी रेखा से कभी नहीं उबर सकते। 


सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील संजय हेगड़े ने कहा कि हम एक अजीब दौर में हैं, आज लोग संविधान को बदलने की बात कर रहे हैं, इसलिए जरूरी है कि संविधान की रक्षा की जाए और यह तभी संभव है जब हम संविधान को सही अर्थों में लागू करें और संविधान को समाप्त करने वालों को यह संदेश दें।


दूसरे सत्र में स्थिति के समाधान पर अपने विचार प्रस्तुत करते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास के प्रो. डॉ. सौरभ बाजपेयी ने कहा कि मुझे इतिहास के अध्ययन के दौरान जिन संस्थानों पर गर्व महसूस हुआ, उनमें से एक जमिअत उलमा-ए-हिंद भी है। इस संस्था के नेता हजरत मौलाना हुसैन अहमद मदनी ने पाकिस्तान बनने का विरोध किया। उनके साथ इस देश के अधिकांश मुसलमान थे। यह बात सत्य से परे है कि 90 प्रतिशन मुसलमानों ने मुस्लिम लीग को वोट दिया। वह आम मुसलमाना नहीं थे, बल्कि सामंत मुसलमान थे, जिनको ही वोट देने का अधिकार था। दिल्ली की जामा मस्जिद के पास पाकिस्तान समर्थकों और विरोधियों की एक सभा हुई। समर्थन करने वालों की सभा में केवल पांच सौ लोग थे और जो विरोधी थे, जिनका नेतृत्व जमीअत उलमा कर रही थी, उनकी सभा में दस हजार की भीड़ थी। उन्होंने कहा कि जो कौम अपना इतिहास भुला देती है, वह खुद को मिटा देती है। भारत के अधिकांश मुसलमानों ने विभाजन का विरोध किया था, यह एक इतिहास है। एक तरफ केवल मुस्लिम लीग थी तो दूसरी तरफ जमीअत उलमा के साथ 19 मुस्लिम संगठन थे। इसलिए देश पर मुसलमानों का अधिकार उतना ही है जितना किसी और का। उन्होंने कहा कि आपसी संवाद तभी सफल होगा जब दोनों पक्ष अपनी विचारधारा और सोचने का तरीका सही कर लें। 


सुप्रसिद्ध लेखिका रजनी बख्शी ने मौजूदा हालात में गांधीवादी अहिंसा आंदोलन की वकालत की और कहा कि अहिंसा का मतलब अत्याचार के खिलाफ चुप रहना नहीं है और न ही इसके लिए किसी को महात्मा बनने की जरूरत है, बल्कि हमें बुरे से बुरे लोगों में भी अच्छाई का भाव जागृत करना है और बुराई की वजह से किसी व्यक्ति से नफरत नहीं करनी है। 


आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के संस्थापक चांसलर रमाशंकर सिंह ने कहा कि वर्तमान संघर्ष कोई साम्प्रदायिक नहीं बल्कि यह देश के अस्तित्व की लड़ाई है। हमें ऐसी स्थितियों से मुकाबला करने के लिए सभी वर्गों और संगठनों का महासंघ बनाना चाहिए। इस देश में साधु-संतों और सूफियों के साझा संदेश तैयार कर के नई पीढ़ियों तक पहुंचाएं और आजादी के नायकों और उनके बलिदान को हर वर्ग तक पहुंचाएं। हमारी लड़ाई जिस ताकत से है, वह बहुत संगठित है, उसका तंत्र सुबह की शाखा से शुरू होता है, वह नई पीढ़ियों के बीच पहुंचते हैं, उन्हें मानसिक रूप से प्रशिक्षित करते हैं और हमने जो खाली जगह छोड़ दी है, उसे वह अपने रंग से भरते हैं। 


जाने-माने ईसाई नेता जॉन दयाल ने कहा कि आज संप्रदायिकता देश की व्यवस्था का हिस्सा बनती जा रही है, यहां अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होता है और फिर सजा भी उन्हें ही दी जाती है। देश के संविधान ने अल्पसंख्यकों के अधिकार तय कर दिए हैं, अगर यह अधिकार छीन लिए गए तो संवाद का क्या फायदा है? 


सिख इंटरनेशनल फोरम के सदस्य सरदार दया सिंह ने कहा कि मुसलमान जो आज हालात का सामना कर रहे हैं, हमने पूर्व में भी ऐसे हालात देखे हैं, हम मुसलमानों के साथ खड़े हैं बल्कि हर प्रताड़ित व्यक्ति के साथ खड़े हैं।

अंत में जमीअत उलम-ए-हिंद के महासचिव मौलाना हकीमुद्दीन कासमी ने सभी अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन किया। ओवैस सुल्तान और मेहदी हसन ऐनी दवबंद ने मेहमानों का स्वागत किया और उनकी मेहमानदारी की। जमीअत उलमा-ए-हिंद के सचिव मौलाना नियाज़ अहमद फारूकी ने संगोष्ठी का संचालन किया। उन्होंने वर्तमान स्थिति पर बहुत प्रभावी प्रजेंटेशन दिया।

अपने विचार व्यक्त करने वाली अन्य हस्तियों में डॉ. इंदु प्रकाश सिंह, विजय महाजन, विजय महाजन,  प्रो. रितु प्रिया जेएनयू, प्रो. एमएमजे वारसी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, डॉ. लेनिन रघुवंशी संस्थापक पीवीसीएचआर, कैलाश मीना आरटीआई कार्यकर्ता, भाई तेज सिंह, तबस्सुम फातिमा, मरीतोन जयसिंह शोधकर्ता, पुष्प राज देशपांडे, फादर निकोलस, जयंत जगियासोजी, अनुपम जी, अवी कठपालिया, हरीश मिश्रा बनारसवाले, डॉ. हीरालाल एमएलए, फादर निकोलस बराला, मोहनलाल पांडा, एडवोकेट सतीश टम्टा, फादर विजय कुमार नाइक, अभिषेक श्रीवास्तव विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।





Politics of Muslims in sithwetion. मुसलमानो की राजनीती में स्थिति !

Politics of  indian muslims of 
                sithwetion.

# भारतीय मुसलमानो को राजनीति में स्थिति  !!







जी हां दोस्तों आप के साथ आज एक नया टॉपिक ले कर हाजिर हुआ हूं, जो की एक मुस्लिम समुदाय का  पॉलिटिक्स से जुड़ा मसला है । वर्तमान समय में हिंदुस्तान के अंदर बीस से पच्चीस प्रतिशत मुस्लिम आबादी है जो की  हिंदू समुदाय के बाद दूसरे नम्बर पर मुसलमानो की आबादी है ।एक बड़ी आबादी जनसंख्या के हिसाब से मायने रखती है । आज हमारे मुल्क हिंदुस्तान में राजनीति बहुत ही हावी हो चुकी है ,इससे कोई भी व्यक्ति राजनीति से बिना प्रभावित हुए रह ही नहीं सकता । हिंदुस्तान की हर रियासत में राजनीति की लहर इस तरह चल बसी है की हर आम आदमी का बचना बहुत ही मुश्किल हो गया है ।लेकिन वर्तमान दौर में बात मुस्लिम समुदाय की हो रही है की इस राजनीति में मुसलमान कहां पर खड़ा नजर आ रहा है ? क्या मुसलमानो की राजनीति में हैसियत है ? अगर राजनीति में उनकी हैसियत है तो उनका क्या मर्तबा है?किस पॉलिटिक्स पार्टी में क्या उनका योगदान है ?

क्या मुस्लमान हाशिए पर धकेला गया ? 

इन सब सवालों को जानने के लिए हम विश्लेषण करेंगे और मुस्लमानों की राजनीती स्थिति को समझेंगे ।जी हिंदुस्तान के मुसलमानो को विरासत में मिली पार्टी कोंग्रेस ही है ,जो हिंदुस्तानी मुसलमानो ने इस पार्टी को सींचा और पाल पोस कर बड़ा किया और राष्ट्रीय स्तर की पार्टी तक और एक  सबसे बड़ी मजबूत पार्टी मुसलमानो ने बनाई  । और ये बात  हिंदुत्व की आइडियोलॉजी को  मानने वाले हिंदुओं ने भी कहा है की ,दरअसल कांग्रेस पार्टी तो मुसलमानो की है , क्योंकि मुसलमान राष्ट्रीय स्तर पर सबसे ज्यादा वोट भी कांग्रेस को ही देते हैं।मुसलमानो ने इस पार्टी को हमेशा गले लगाए रखा ,और जब बात वोट देने की आती है तब इन्होंने100 में से 95 प्रतिशत वोट हमेशा कांग्रेस को दिए ,। बाकी 5 प्रतिशत वोट इधर उधर अन्य पार्टियों को गए होंगे जिसमे कोई दो राय नहीं । आज हिंदुस्तान में दो बड़ी राष्ट्रीय स्तर की पार्टियां है जो एक पार्टी अपने आप को सेकुलर मानती है वो है कोंग्रेस और दूसरी पार्टी राष्ट्रवाद का दावा करती है वो है भाजपा एक पार्टी  मुसलमानो की रहबरी का  दावा करती है ,तो दूसरी पार्टी मुस्लामनो को सिरे से खारिज करती है और ये कह कर की हमे मुसलमानो के वोट चाहिए ही नही । तो फिर मुस्लिम एक पार्टी से डर कर सेकुलर का दावा करने वाली पार्टी  से जा गले मिलते है , और दावा करती है की मुसलमानो के हम रखवाले है । फिर मुसलमान बेचारा थका हारा,मांदा,आखिर जाए तो जाए कहां ?आज हमारे मुल्क में हर रियासत में अलग अलग राजनीतिक पार्टियां अथवा दल है ,भाजपा जो वर्तमान में राष्ट्रीय स्तर की बड़ी पार्टी बन चुकी हैं जो की उनको मुस्लिम वोटर्स की जरूरत है ही नही ,तो फिर मुस्लिम वोटर्स की जरूरत है किसको ,जरूरत तो उनको है जो अपने आप को सेकुलर मानती है की हम आप की रक्षा करते है। , इस स्थिति को ज़रा समझना होगा कि वर्तमान दो राजनीतिक दल एक कांग्रेस और भाजपा दोनों में बुनियादी फर्क ये है की एक मुस्लिम वोटर्स को ये चैलेंज करती है की आप के के वोटों की हमें जरूरत है नही, तो ये उनका एक पीछे बहुत बड़ा राज़ है ,की हम से हिंदू वोटर्स जुड़े रहे और हम सत्ता में हमेसा बने रहे और मुस्लिमों के चांद वोटों की जरूरत है नही ताकि हमें इस जुमले से हिंदू वोट मिल जायेंगे और सत्ता के अनुकूल सब कुछ चलता रहेगा , लेकिन ये कह कर मुस्लमान डर कर हम से दूर हो जाए ।

फिर जब दूसरी पार्टी कांग्रेस जो मुस्लामानो को अपना रखवाला समझती है , हालांकि वो मुसलमानो को टिकट भी देती हैं,उतना ही देती है जितना ऊंट के मुंह में जीरा,लेकिन बीजेपी के मुकाबले जरूर टिकट ज्यादा देती है ,और मुसलमानो के वोट्स कांग्रेस को 95 प्रतिशत जाते है । हिंदुस्तान की मुख्तलिफ रियासतों में में क्षेत्रीय दल है ,वो भी मुसलमानो को अपनी गोद में लेके बैठे है और ये कह कर की आप उधर इधर मत भागिये वरना बीजेपी आप को मार डालेगी।  जो बीजेपी नही करती वो क्षेत्रीय दल और सेक्युलर दल ही काम तमाम करते है ,फिर हमारे जुम्मन मियां साहब को समझते है बड़े प्यार से की देखो ज्यादा आप बोलोगे तो बीजेपी आ जायेगी और आप को खतरा हो जायेगा , जैसे एक कहावत है न की शरारती बच्चे को जब मां चुप कराने के लिए कहती ही की बेटा बदमाशी मत कर ,वरना बिल्ली आ जायेगी और उठा के ले जायेगी । यही स्तिथि सेकुलर पार्टी का दावा करने वाली क्षेत्रीय दलों का है जो मुसलमानो को इस तरह करके अपने पाले में रखते है । ताकि हम लोग सेकुलर का ढोंग रचते रहे और जो खेल खेलना हैं वो भी पूरा करते रहें।इससे वो भी अपने आप को महसूस करने लगता है को वास्तव में अगर दूसरी पार्टी आएगी तो हमे खतरा उत्पन्न हो जायेगा ,इससे विकास की तो बात छोड़िए लेकिन 5 साल शांति से तो रह पायेंगे और अपनी आजीविका सही से कमा पाएंगे।इसी आसरे को लेकर कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों को वोट देते है ।

इन सब बातों के बावजूद सेकुलर पार्टी का दावा करने वाली मुसलमानो को किस स्तिथि में रखती है ये देखना सबसे अहम जरूरी है, मुसलमानों को अपने प्रचार प्रसार में चुनावी रैलियों की भीड़ भाड़ दिखाने के लिए ,और रोज़ा इफ्तार पार्टी की दावत करने के लिए , दरी बिछाने के लिए इस्तेमाल करते है ,कुछ मामूली उम्मीदवारों को टिकिट देकर ये कह कर की बीजेपी तो मुसलमानो को एक भी उम्मीदवारों को टिकट नहीं देती है ,जब सेकुलर पार्टी का दावा करने लीडर जब सत्ता में आ जाते है तो किसी एक मुस्लिम को अल्पसंख्यक मंत्री का दर्जा दे देते है ,और सत्ता की मलाई तो खुद खाते है ,मुस्लिम आवाम का कोई विकास नहीं , वो बेचारा हुश में खुश लेकिन विकास का कोई अता पता नहीं केवल केवल ये पल्ला झाड़ने के लिए की हम ने तो मुसलमानो को टिकट भी दिया और अल्पसंख्यक मंत्री भी बना दिया । इस वाक्य का पीछे का मतलब इतना ही है की सिर्फ और सिर्फ मुसलमानो को राजनीति में इस्तेमाल करो use and throw वाली कंडीशन है । आखिरकार मुसलमानो को सभी राजनीतिक दल हाशिए पर धकेलना चाहते है और धकेल दिया गया है ।

आज भी सत्ता में बैठे क्षेत्रीय राजनीतिक दल बड़े बेड़े दावे करते है की हम लोग 36 कॉम का विकास करते है ,लेकिन ये उनके दावे धरातल पर सिर्फ धरे  के धरे रह जाते है । लेकिन जब अल्पसंख्यक के गांव और कस्बे में जब जाते है तब वाह के हालात बता देते है की मुसलमानो के गांव या ढाणी और कस्बे में क्या हाल है ?मुसलमानो के अधिकतर गांवों में पीने के लिए पानी  उपलब्ध है ही नहीं है , वहां स्कूल भी नही अगर स्कूल है तो भी पढ़ने वाला अध्यापक नही है , उस गांव या ढाणी में बिजली उपलब्ध नहीं है,मिनी अस्पताल भी नही इलाज के लिए दूर दराज के शहरो में जाना पड़ता है जिसे उन ग्रामीण लोगो को तकलीफों का सामना करना पड़ता है । आज भी ऐसे गांव है जहां पर आवागमन के लिए पकी सड़क है नहीं जिससे ग्रामीण लोग आज भी पैदल जातें है , हां ये बात जरूर है की वहां पर पुलिस थाना जरूर होगा , क्युकी उससे सरकार को और प्रशासन को फायदा होता है ,लेकिन मूलभूत सुविधाओं की कमी होगी कहां पर , जहां पर वहां पर मुस्लिम आबादी जायदा है ।

मुसलमानों को किस चीज की जरूरत है ?

आज के युग में अगर मुसलमानो को जरूरत है तो उनको समाजिक न्याय, आर्थिक न्याय,और पॉलिटिकल न्याय इन तीनो की न्याय की जरूरत है इन तीनों न्याय के आसरे ही किसी भी कॉम या समुदाय का असली विकास होता हैं और उस समुदाय का उत्थान होता है ,लेकिन काफी हद तक मुसलमानो के पास ये विकास के आयाम बिलकुल पहुंच ही नही पाते जिससे मुसलमान की स्तिथि दलित और आदिवासियों से भी बदतर है ।

आज के संदर्भ में देखा जाए तो मुसलमानो के पास नोकरियों में आरक्षण नही है ,दूसरे समुदाय के पास आरक्षण है जिससे उनका अनुपात ज्यादा है ,मुसलमान रोजगार में पिछड़ा हुआ है जिससे उनकी इकोनॉमिक कंडीशन बहुत ही खराब है ।मुसलमानों के पास राजनीतिक इंपोवार नही है जिससे उनका प्रतिनिधित्व बराबर नही मिल पता है इसलिए उनके क्षेत्र की आवाज सदन में नही सुनाई देती ।मुसलमान छात्रों को पढ़ने के लिए स्कॉलरशिप सरकार नही देती जिससे छात्र पढ़ाई से ड्रॉप आउट हो जाते है ,मुसलमानों की बस्ती में उप स्वास्थ्य केंद्र नही खोलती जिससे उनकी स्तिथि और भी खराब होती है ।

लेकिन देखे जाए तो हिंदुस्तान की आज़ादी से लेकर आज  तक 76 साल हो चुके हैं ,लेकिन मुसलमानो की स्थिति में सुधार अभी तक नही आया है ये में नही कह रहा हु बल्कि केंद्र सरकार का डाटा कह रहा और सच्चर समिति,रंगनाथ मिश्र की समिति कह रही है की हिंदुस्तान में को समुदाय या धर्म पिछड़ा हुआ है तो वो मुसलमान है लेकिन सरकार सब खामोश !मुसलमानों के विकास की बात आती है सेकुलर पार्टी में बैठे उनके अपने ही साथी ये कह कर कहते है की सिर्फ और सिर्फ सरकार मुसलमानो की है ,हमारी कुछ सुनती नही तब सरकार के मुखिया ठप हो जाते हैं ,फिर आगे देखेंगे तब तक काम रुक जाता है और बीच में नया एजेंडा लागू किया जाता ह तब तक मुसलमानो के विकास को भुला दिया जाता है । आखिर कार मुसलमान हाशिए पर धकेला जाता है । हर पार्टी और क्षेत्रीय दल मुसलमानो के साथ अपनत्व का ढोंग रचते है लेकिन हकीकत में मुसलमानो को सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय ,और पॉलिटिकल न्याय कोई भी दल या पार्टी देने के लिए तयार नही है ।

जी हां मुसलमानो की वर्तमान राजनीति में हैसियत उतनी ही  है जितनी ऊंट के मुंह में जीरा ,आज चाहे कोई भी पार्टी या क्षेत्रीय राजनीतिक दल हो ,लेकिन अपने आप को सेकुलर मानने से कुछ नही होगा बल्कि सेक्युलरिसिम पर चलना होगा ,और हर गरीब मुस्लमान और दलित वर्ग को भी साथ में बिठाना होगा उनके हित में काम करना होगा उनके सामाजिक ,और आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए काम करना होगा तभी सेकुलर पार्टी का दावा करने वाले बड़े बड़े राजनीतिक दल अपने आप को प्रमाणित नही कर पाएंगे।सिर्फ और सिर्फ मुंह में खजूर डालने से और दरी बिछाने से कुछ उनका विकास नही होगा । अगर आप लोग इस तरह का सेक्युलर दावा करते रहोगे तो उनका शोषण होता रहेगा , फिर जनता बड़ी जनार्दन है ,कोई और विकल्प देख लेगी, जिससे आप की अहमियत को कहीं खतरा न हो जाए ।


नोट: ये मेरे निजी एव स्वतंत्र विचार है किसी राजनीतिक         दल से प्रत्यक्ष संबंध नही है ।

                         धन्यवाद 

आप का दोस्त ,साथी ,लेखक , स्वतंत्र विचारक 

                 मुराद खान जयसिंधर 

                   जय हिंद जय भारत 












 

अल्लाह की गैबी मदद, اللّٰہ کی غیبی مدد

        अल्लाह की गैबी मदद  कब तक  🤔



*स्पेन* हाथों से निकल जाते वक़्त ग़ैबी मदद नहीं आई,  *न खिलाफत ए उस्मानिया* खत्म होते वक़्त आई,  न *इज़राइल* के क़याम को रोकने आई,  न *बाबरी मस्जिद* शहीद होते और छिनते वक़्त आई, न *इराक़* और *सीरिया* बर्बाद होते वक़्त आई,  न *म्यांमार(बर्मा)* मुसलमानों के क़त्ल ओ ग़ारत पर आई......

फिर भी घरों और मस्जिदों में बैठकर  ग़ैबी मदद की सदा..????

ग़ैबी मदद कब आती हे👇

ग़ैबी मदद *जंग ए बद्र* में आई थी जब हज़ारों के मुकाबले सिर्फ 313 मैदाने जंग में उतरे।

ग़ैबी मदद *जंगे खन्दक* में आई,जब *मेहबूब ए इलाही ﷺ*  ने पेट पर  पत्थर बांधकर ख़ुद ख़न्दक खोदी और मैदाने जंग में उतरे।

अल्लाह की मदद *जंगे ओहद,  हुनैन,  तबूक, और फतह ए मक्का* के वक़्त आई थी, 

अल्लाह की मदद, *उमर बिन ख़त्ताब,  ख़ालिद बिन वलीद,  तारिक़ बिन ज़ियाद,  सलाह उद्दीन अय्यूबी,  मोहम्मद बिन क़ासिम, अरतुगरुल बिन सुलेमान* जैसे *मर्दे मुजाहिद ग़ाज़ीयों, जियालों* के पास आती है।


और हम हैं कि...

तागूती निज़ाम पर राज़ी हैं,..

*और ग़ैबी मदद के मुन्तज़िर-???*🤔


क़ीमती लिबास पहनकर, *माल* और *ज़र* जमा करके, लक्ज़री ऐरकंडिशन गाड़ियों में बैठकर, 

झुके-झुके लोगों से हाथ चुमवाकर,  मिम्बर पर बैठकर लोगों की वाह वाह की खुहाइश लेकर, मुसल्ले पर बैठकर दुआओं में, ज़ालिम को सिर्फ बद्दुआ देकर...

*ग़ैबी मदद के मुन्तज़िर???*🤔


मातम, नात खुआनी, महफ़िल ए मिलाद, वज़ीफ़े, इमली दाने या तस्बीह के दानों को 10लाख, 20लाख बार घुमाकर....

*ग़ैबी मदद के मुन्तज़िर...??*🤔


*आफ़ाक़ी दींन* को चन्द जुज़याते इबादत में महदूद और कैद करके...

*ग़ैबी मदद के मुन्तज़िर..??*🤔


नोजवान नस्ल को *उक़ाब* से *मुर्ग़ा* बनाके, *मुजाहिद* से *मुजाविर* बनाके, *निज़ाम ए इलाही* की जद्दो-जहद और *जज़्बा ए शहादत* से दूर करके, *तागूती निज़ाम* को ख़ुशी ख़ुशी तस्लीम करके, ज़ालिम और बातिल को सिर्फ बद्दुआ देके....

*ग़ैबी मदद के मुन्तज़िर??*🤔


*फिलस्तीन, सिरिया, इराक़, सूडान, नाइजीरिया*, के हालात जानकर भी हलक़ तक खाना खाके, मीठी और गहरी नींद सोके..

*ग़ैबी मदद के मुन्तज़िर??*🤔


यानी सब कुछ *अल्लाह* के ज़िम्मे करके, ख़ुद बुज़दिली इख़्तेयार करके..

*ग़ैबी मदद के मुन्तज़िर??*🤔


*सीरत ए नबी ﷺ* और *सीरत ए सहाबा* तो हमें बताती हैं कि पहले ये *मैदान ऐ जंग* सजाते फिर अल्लाह से ग़ैबी मदद के लिए हाथ उठाते🤲, 

और हमारे हाथ सिर्फ अपनी ख्वाहिशात पूरी करने और ज़ालिम ओ बातिल को बद्दुआएं देने के लिए उठते हैं।

*ऐसी सूरत में सिर्फ अल्लाह का अज़ाब आता है ,, ना कि ग़ैबी मदद।।* 



*आज हमारी हालत ऐसी है कि हम गफलत की नींद सो कर गैबी मदद का इंतजार कर रहे हैं, और हमारे हालात दिन पर दिन बद से बत्तर होते जा रहे हैं*



*अगर गैबी मदद से कौम के हालात सुधर ते तो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहो ताला अलेही वसल्लम जंग के मैदान में कभी ना उतरते*



*ए लोगो याद रखना अगर घरों में बैठकर गैबी मदद का इंतजार करा जाता तो जंग ए खैबर कभी ना होती और हज़रत अली शेरे खुदा खैबर कभी ना उखड़ते*


 

*अगर घरों मैं बैठकर गैबी मदद का इंतज़ार कर कौम के हालात सुधारे जाते तो हजरत खालिद बिन वलीद रजि अल्लाह ताला अन्हू जंग कभी ना करते*


*यहां पर जंग से मुराद लड़ने से नही है, बल्कि मैदान में उतरकर अपने हक के लिए खड़े होने से है, अपनी हक़ की लड़ाई लड़ने से है, ना के अपनी आराम गाहो में गफलत की नींद सोने से*



*तुम कहते हो कि तुम तादाद में कम हो याद रखना तुम्हारी ताकत तुम्हारी तादात नहीं तुम्हारा ईमान है मत भूलो वो 113 हम में से ही थे, तुम अपना ईमान मज़बूत करो अल्लाह तुम्हे मज़बूत कर देगा*



*कसम खुदा की तुम अपने दिल में खुदा का खौफ पैदा तो करो उसका डर पैदा तो करो कसम से दुनिया के खौफ से दुनिया के डर से आज़ाद हो जाओगे*



*याद रखना इंसान को मौत उस वक्त तक नहीं आती है जब तक मौत उसके नसीब में ना हो, मौत खुद ज़िंदगी की हिफाजत करती है, अपना वक्त पूरा होने तक, और जब मौत नसीब में होती है तो ज़िंदगी खुद मौत से जाकर गले लग जाती है।*



*ज़रा सोचो मरने के बाद अपने रब को क्या जवाब दोगे*।    फिर कहते हैं की अल्लाह की गैबी मदद कब आएगी !     


                अल्लाह की गैबी मदद कब तक !

उस वक्त तक नहीं आएगी जब तक हम अंदर और बाहर से अल्लाह की रस्सी को मजबूती से पकड़ेंगे नही और मोहम्मद सल्लाहू अलैहि व सल्ल्म  का तरीका नही पकड़ेंगे,अल्लाह के हुकुम को नही मानेंगे और नबी अलैहिस्सलाम का तरीक ए कार पर अमल नहीं करेंगे ,तो सोचो हमारे साथ क्या मामला होगा !

हमें ईमान पर चलना होगा ,और ईमान के लिए अमली काम करना पड़ेगा तभी कुछ अल्लाह की मदद आएगी ,और साहबाओं जैसा ईमान होना चाहिए तभी तो हालात अपने मुताबिक होंगे , ऐसे बैठे बैठे काम नही होंगे ।

आज हमे जरूरत इस बात की है की हमे चाहिए की अल्लाह के हुकुम के मुताबिक अपनी जिदंगी 

Powar Of pen कलम की ताकत


       # Kalm ki takat (कलम की ताकत ) 

जी हां दोस्तों आज बात कलम को लेकर को जा रही हैं जिस व्यक्ति के पास कलम है , वो इंसान एक ताकतवर माना जाता है अथवा यहां तक की कामयाब इंसान माना जाता है । ताकतवर व्यक्ति का नाम तो सुना होगा आप ने  जिला कलेक्टर, तहसीलदार, मुख्य नयाधीस, डॉक्टर, प्रोफेसर, मुख्य सचिव, बीडीओ, सीईओ,अध्यक्ष।इन व्यक्तियों के पास कलम की ताकत है । साथियों कलम की ताक़त अपने पास केसे आएगी? इसके लिए हम और आप को संघर्ष करना पड़ेगा। वो संघर्ष है शिक्षा,आप को इस शिक्षा के रास्ते को चुनना होगा ? सिर्फ़ शिक्षा के रास्ते को चुनना ही नही बल्कि उस पर अनुसासन और ईमानदारी से उस पर अमल करना होगा , उस शिक्षा रूपी रास्ते को हासिल करने के लिए आप को कड़ी मेहनत करनी होगी । हमारे पास शिक्षा के दो रास्ते हैं एक रास्ता है दीनी तालीम ( मज़हबी तालीम ) दूसरा रास्ता है दुनिया की तालीम ( असरी तालीम) ,हमें इन दोनो रास्तों को अपनाना होगा ,  दीनी तालीम हमें हर हाल में हासिल करनी होगी ताकि हम लोग अपने मज़हब पर सही तरीके से चल सके , हमारे दिलों में मजहबी तालीम होगी तो अल्लाह और हमारे नबी ( स.अ.स) के तरीके पर चल सकेंगे और इंसानियत की भलाई करते हुए दुनिया के सीधे रास्ते की तरफ बढ़ेंगे। अगर आप और हम लोगों को दुनिया में कामयाबी को हासिल करना है तो हम को चाहिए की हमें हमारे बच्चो को सबसे पहले दीनी तालीम हासिल करवाएं फिर उसके बाद दुनिया की तालीम दिलवाए।वो बच्चा दीन और दुनिया दोनो मैदान में सितारे की तरह चमकता नजर आएगा । मेरे प्यारे साथियों और दोस्तों हमें आज के दौर में दोनो तरह की तालीम (शिक्षा) हासिल करनी होगी क्योंकि। आज का दौर फितनो का दौर है हमें हमारे बच्चो के ईमान को बचाना सबसे जरूरी है । इस शिक्षा के दोनो रास्तों पर चलना होगा जिससे हम कामयाब हो सकते हैं, हमारे पास शिक्षा के खजाने भरे पड़े है लेकिन हम उस तरफ कभी लोटे ही नहीं,जिससे हमारी बड़ी बदकिस्मती है ।
सबसे बड़ा ताकतवर कोन ? 
आज के युग में सबसे बड़ा कामयाब या ताकतवर इंसान वही है जिसने उच्च शिक्षा प्राप्त की है और उसका इस्तेमाल सही तौर पर किया हो ? हमें ये कहने में कोई झिझक महसूस नहीं की वो एक कामयाब इंसान नही है। 
अगर किसी व्यक्ति ने कलम के जरिए संघर्ष के रास्ते को चुना और वह उस लक्ष्य को हासिल करने में काफी हद तक कामयाब हुआ , नही । लेकिन कामयाब इंसान वही 
जिसने सही तरीके से अपने पद का प्रयोग किया और गरीब व्यक्ति के दिल को जीता , असल कामयाब तो वही व्यक्ति है ।
सबसे ताकतवर वही व्यक्ति जिसने शिक्षा को कठिन प्रिस्तिथ में हासिल किया हो और वह इंसान कामयाब हो गया हो । आज दुनिया में कामयाब वही इंसान या समाज और समुदाय है जिसने कलम का प्रयोग सही तौर पर किया हो , दुनिया में उनका ही दबदबा है ,वो जो चाहते हैं वो कर भी देते है ,उनके पास सब कुछ संसाधन है ,उनके पास राजनीतिज्ञ लोग है ,उनके पास अर्थशास्त्री भी ,उनके पास वैज्ञानिक भी है ,उनके बस eniginar भी है ,उनके पास सामाजिक लोग भी है और उनके पास दानदाता लोग भी है उनके पास आर्थिक संसाधन भी है सब कुछ कुछ उनके पास ही तो है , हमारे पास है ही क्या ? ये कोन लोग है ? जिन्होने शिक्षा को को अपना हाथियार बना के इस्तेमाल किया हो ,दिन और रात उसी काम में लगे रहे ,आखिर कामयाब तो वही हुए । बाकी वाले ,इंतजार करते रहे कहते है न की इंतजार करने वालों को उतना ही मिलता है जितना इंतजार करने वाले पीछे छोड़ जाते है -DR.A.P.J.ABDUL KALAM
आज हमारे मुल्क हिंदुस्तान के अंदर यही हाल है जिन जिन कोमो ने संघर्ष किया और शिक्षा के रास्ते को इन्होंने अपना एक मकसद बना लिया , आखिरकार वो लोग अथवा वो समुदाय कामयाब हो गए । जिन्होने शिक्षा को कुछ समझा ही नही वो आखिर कार  फेल साबित हो गए । जो समाज या समुदाय शिक्षा में आगे है उनके, है व्यक्ति हर विभाग में कार्यरत है ,चाहे वो ऑफिसर हो या अधिकारी हो या कर्मचारी हो यहां तक क्लर्क या चपरासी भी इन सभी का जुलूस  नजर आता है ,लेकिन जिस समुदाय या समाज के तबके के पास शिक्षा नही है उनका कोई व्यक्ति नजर क्यो नही आता है ? असल सवाल तो ये है ? क्योंकि उन्होंने शिक्षा को अपना मकसद समझा ही नही ,तो फिर किस चीज को अपना मकसद समझा ? जरा सोचने की बात है । ये बात हमारे लिए फख्र की बात नही बल्कि अफसोस की बात है । हमने शिक्षा को कुछ समझा ही नहीं तो फिर हम ने किस चीज की तरफ ध्यान दिया ? देश आजाद हुए को आज 76 साल हो चुके हैं ,लेकिन हमारा शिक्षा में हमारा स्तर सभी समुदाय से कम ! लेकिन पिछड़े वर्ग में हम ज्यादा !  जेल में हमारी जनसंख्या का अनुपात ज्यादा , पुलिस थानों में हमारे खिलाफ मुकदमे ज्यादा ? शिक्षा में हमारे बच्चे सबसे ज्यादा ड्रॉप आउट ? हमारे लोग फालतू पैसे खर्च करने में सबसे आगे ( शादी , ओसर,अन्य और जमीन जायदाद ) वगैरा में हम लोग आगे । अस्पतालों में हमारी संख्या ज्यादा ? 
तो फिर शिक्षा जैसे मूल्यवान चीज को प्राप्त करने में हम लोग पीछे क्यो? जिससे शिक्षा प्राप्त करने से कलम की ताकत आप के हाथ में आ जाती है , उस तरफ अपना ध्यान क्यो नही जाता ? आज जो समाज हम से दुनिया की तालीम में आगे निकले हैं उन्होने हम मुसलमानो की नकल की है एक मुस्लमान जिस तरह पूरे कुरान शरीफ़ अल्लाह की किताब को  बैगर देखे याद कर लेता है तो हम क्यो नही याद कर लेते है। इस्लाम की नकल गैरों ने अपना ली। हम लोगो ने अपना तरीका छोड़ दिया जिससे हम लोग दुनिया की तालीम से पिछड़ ही गए ,और साथ साथ में दीनी तालीम में भी पिछड़ गए ,न घर के न घाट के ,अगर एक तालीम को मजबूती से पकड़ लिया होता तो तो आज हम इस कलम की ताकत से महरूम नही होते
दीनी तालीम की इतनी महत्ता है की अगर आदमी सही से तालीम हासिल करके ईमान और अकीदे के साथ इस पर अमल करते हुए , अपने समुदाय की रहनुमाई करते नजर आते है ,जैसा की आज हमारे बीच कुछ उलेमा नजर आ रहे हैं,उनके पास दुनिया की तालीम नही है फिर भी हमारे जैसे बुज्दिलो की हौंसला अफजाही करते नजर आ रहे है । दुनिया की तालीम से बेहतर रहनुमाई करते नजर आ रहे हैं,हमें ऐसे उलमाओ पर बड़ा फख्र और नाज़ है ।  आज के इस पूर फितन दौर में हमारे कायिद और रहबर हमारी हर प्लेटफार्म से रहबरी कर रहे हैं।जिससे मुझे कहने में कोई शक नही की , दीनी तालीम एक बेहतरीन और लाज़वाब तालीम है,जिसकी ला तादात कीमत है।

लेकिन अफसोस इस बात का है की हम लोग इस दुनिया की तालीम से पिछड़ गए जो हमारे लिए दुनिया में तो कम से कम चासनी चखने का स्वाद जरूर मिलता,लेकिन बदकिस्मती से हम लोग इसे भी महरूम रह गए।आज हिंदुस्तान हमारी आबादी  20-25 फीसदी है है जनसंख्या के हिसाब से हम लोग दूसरे नंबर पर है ,लेकिन बाकी सरकार के जितने भी मानक है उनमें सबसे हम पिछड़े क्यों? शिक्षा में देख लो ,राजनीति में देख लो , व्यापार या व्यवसाय में देख लो ,आर्थिक स्थिति में देख लो और सरकारी नौकरी में देख लो ,हर स्थिति में हम लोग पिछड़ते नजर आ रहे हैं।क्योंकि हम लोगो ने हमारे बड़ों ने ,और पटेलों ने ,हमारी कॉम के रहबरी करने वाले नेताओं में कभी उस और ध्यान ही नही दिया ,अगर दिया होता तो उनकी रोटियां सेकनी बंद हो जाती शायद! 


कलम जेसी ताकत को प्राप्त करने के लिए हमें हमारे गांव या शहर में स्कूल की हालत को देखनी होगी ,तभी तो हम कलम की ताकत को हासिल कर पाएंगे ।   है । समझने वालों के लिए बहुत कुछ मगर न समझने वालों के लिए कुछ भी नही हैं।
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कलम जेसी ताकत से महरूम रहने के लिए            जिम्मेदार कोन? 
 इसके लिए जिम्मेदार तो लगभग सभी है  सबसे पहले तो हम लोग है जिन्होने कभी शिक्षा की तरफ ध्यान दिया ही नहीं ,जो की हमारी सबसे बड़ी गलती है ।और हम ने ये गलती जानबूझकर की है इसके दोषी तो हम खुद ही है और कोई नही ।
दूसरा जिम्मेदार तो सरकार है जो सरकार ने इस पिछड़े वर्ग का कभी शिक्षा की तरफ ध्यान दिया ही नहीं ,हां सरकार ने ध्यान जरूर दिया मगर उतना नहीं जितना देना चाहिए ।
तीसरा जिम्मेदार तो विद्यालय खुद है जहां पर मुस्लिम आबादी है वहां पर उस 🏫 स्कूल में न तो पर्याप्त स्टॉफ है और न ही विद्यालय में प्रमूख संसाधन उपलब्ध है,अगर स्टाफ उपलब्ध है भी तो उसको अन्य कामों में लगाया जाता है जिससे पढ़ाई बाधित रह जाती है , इसलिए भी शिक्षा से महरूम रह जाते है फिर प्रयाप्त पढाई नही हो पाती है , इसलिए हम लोग कलम की ताकत से महरूम रह जाते है ।
जब तक आज कल के पढ़े लिखे नौजवान तबका पढ़ाई की तरफ या school ki तरफ़ ध्यान नहीं देंगे तो हमारा ही नुकसान होगा ,न तो सरकार का और न ही वहां पर लगे अध्यापकों का। हमें अपने स्कूल का निरीक्षण करना होगा और अध्यपको के बारे में राय मशोरा लेना होगा ।
स्कूल में किन किन संसाधनों की कमी है उसको अध्यापकों के साथ मीटिंग करके उन चीजों की कमी को पूरा करना होगा । हमारे विद्यालय में शिक्षकों के पद रिक्त है तो हमारे जन प्रतिनिधि सरपंच हो या विधायक से मिल कर मांग करनी होगी जिससे हमारे बच्चो को सही समय पर शिक्षा मिल सकेगी ।
कलम की ताकत ऐसे ही नही मिलती है इसके लिए एक व्यक्ति को ,समाज को ,और सोसायटी को मिलजुल कर संघर्ष करना होगा ,उसके लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ेगी । हमारे जीवन में शिक्षा आएगी तब कड़ी से कड़ी जुड़ेगी ,तभी कारवां बढ़ेगा ,कारवां बढ़ेगा तभी तो हमारी ताकत बढ़ेगी,तभी तो हम लोग जीवन मे आगे बढ़ पाएंगे । कलम की ताकत किसे कहते है ,तो इसी को तो ही दोस्तो कलम की ताकत कहते है ।

"अपनी झोली में फल यूं ही नहीं गिरते 
 मेरे दोस्त वक्त की शाख को हिलाना पड़ता है।"


         Thanks 🙏 for visiting 
 Aap ka dost , sathi ,lekhak                                       MURAD KHAN 
                 JAISINDHER 


















Zang e aazadi men hindustani muslmano ka aham kirdar


जंग ए आज़ादी में हिंदुस्तानी मुसलमानो का अहम किरदार।

दोस्तों सलाम व आदाब जैसा की आप को मालूम है की आज हम लोग राष्ट्रीय आजादी दिवस मनाने जा रहे है।
इस हिंदुस्तान की आज़ादी में हर कॉम और मजहब का अहम किरदार रहा है लेकिन दिलचस्प बात ये है की किस कॉम या समुदाय की कितनी अहम भूमिका है ।

भारतीय राष्ट्रीय राज्य निर्माण में हिंदुओ के साथ साथ मुसलमानो का अहम योगदान रहा है। मुगलों के आने के बाद भारत वह राष्ट्र का स्वरूप नही रहा ,जो प्राचीन काल में था। मुल्क की सभ्यता और संस्कृति में कई बदलाव आए और साझी संस्कृति का निर्माण हुआ। जंग ए आजादी में हिंदुओ ने नही बल्कि मुसलमानो का भी अहम योगदान रहा। इस आज़ादी की लडाई में मुसलमानो ने लाखों करोड़ो कुर्बानियां दी है जिसका इतिहास गवाह है। बड़े अफसोस की बात ये है की आज मुसलमानो की कुर्बानियों को भुलाया जा रहा है,बहुत ही एक दो गिने चुने  सांवत्रता सेनानियो के सार्वजनिक स्थानों पर
 आजादी के मौके पर नाम लिया जाता है । दक्षिण पंथी
 लोग मुसलमानो को गद्दार सिद्ध करने में लगे है , लेकिन ठीक से मुसलमानो के इतिहास को पढ़ा नहीं गया और इतिहास को लिखने वालों ने मुसलमानो के इतिहास को रेखांकित किया ही नही। जिस तरह हिंदुओं के इतिहास को गहराई से पढ़ा गया और परखा गया मगर मुसलमानो के इतिहास को दरकिनार किया गया । दरअसल मुस्लमानो के इतिहास लेखन में पूरी तरह न्याय नहीं होने की कारण उन्हे दरकिनार किया गया । इसलिए मुसलमानों के योगदान को अहम नही माना ।

शय्यद शाहनवाज अहमद कादरी और कृष्ण कल्कि की अहम 📚 बुक जिसका नाम है, "लहू बोलता है " जिसमें मुसलमान जंग ए आज़ादी में शहीद होने वालों की बड़ी फहरिस्त छपी है और उनके कारनामे भी विस्तार से दिए हुए हैं। आजादी की लडाई में कितने मुस्लामनो ने फांसी के फंदे को चूमा था? कितने मुस्लामनों ने लाठियां खाई थी? कितने मुसलमान शहीद हुए थे? कितनो को काले पानी की सजा हुई थी ? इसका लेखा जोखा शायद ही पहली बार इस किताब में पेश किया गया।कादरी साहब ने पहली बार लंबी एक लिस्ट बनाई है जिसमे मुसलमानो के किरदार को पेश किया गया है ।



दोस्तों इस लेख को ज़रा गौर से पढ़िए 




आज़ादी की लड़ाई में मदरसा-ए-इस्लामिया
विद्वानों का बलिदान

लेखक: मौलाना शौकत अली कासमी बस्तवी
दारुल उलूम देवबंद में अरबी तफ़सीर और साहित्य के शिक्षक, अखिल भारतीय संपर्क मदरसा इस्लामिया अरब के महासचिव
 

भारत के इस्लामी स्कूलों ने अज्ञानता और अशिक्षा को दूर करने, विज्ञान और कला की शिक्षा और प्रकाशन, और इस्लामी राष्ट्र के धार्मिक और राष्ट्रीय मार्गदर्शन और मार्गदर्शन का कर्तव्य पूरा नहीं किया है; बल्कि इन मदरसों की सेवाएँ देश और राष्ट्र के व्यापक हित में, विशेष रूप से ब्रिटिश साम्राज्यवाद, गुलामी और पराधीनता के अत्याचार और अत्याचार से मुक्ति दिलाने और देश की जनता को आज़ादी की राह पर लाने में बहुत उज्ज्वल हैं। , इस्लामिक मदरसे और उनके नेता। उनके बलिदान धन के साथ लिखे जाने योग्य हैं। वे इस्लामिक मदरसों के कट्टर विद्वान थे जिन्होंने देश में आजादी का बिगुल उस समय फूंका था जब अन्य लोग आम तौर पर नींद से बेखबर थे। स्वतन्त्रता की आवश्यकता और महत्ता का और वे गुलामी की भावना से भी रहित थे।

उसी नदी से वो लहर भी उठती है

व्हेल के घोंसले जो ऊपर और नीचे बनते हैं

लेकिन यह भी एक बड़ी राष्ट्रीय त्रासदी है कि 15 अगस्त के ऐतिहासिक और यादगार राष्ट्रीय दिवस के शुभ और शुभ अवसर पर जब मुजाहिदीनों के बलिदानों को याद किया जाता है और उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है, तो इन विद्वानों और मुजाहिदीन हुर्रियत को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया जाता है। जिन्होंने देश की आजादी के लिए कारावास और कैद की यातनाओं को सहन किया, माल्टा और काला पानी में सभी प्रकार की यातनाएं सहीं और आत्म-बलिदान और आत्म-बलिदान की ऐसी मिसाल कायम की, जिसकी कोई मिसाल नहीं है और देश की नजर है- उनके बलिदानों का गवाह.

चलो चलें , चलें , चलें _ _ _ _                  

(यदि आप फूल को नहीं जानते,                                    तो आप नहीं जानते, पूरे बगीचे को जानना होगा)।।

देश का एक वर्ग इस ग़लतफ़हमी से ग्रस्त है कि धार्मिक और इस्लामी मदरसे राष्ट्रीय मुख्यधारा से पूरी तरह अलग-थलग हैं, देश और राष्ट्रीय हितों के प्रति उदासीन हैं और केवल धार्मिक शिक्षा के प्रकाशन में लगे हुए हैं। वे जागरूकता और समझ से भी वंचित हैं। समाचार और देश-राष्ट्रीय सेवा का. लेकिन मदरसा इस्लामिया का गौरवशाली अतीत इस धारणा को बिल्कुल गलत और बेबुनियाद करार देता है और भारतीय इतिहास के माथे पर दर्ज मदरसा इस्लामिया की घरेलू और राष्ट्रीय सेवाओं और उपलब्धियों की छापें चीख-चीख कर कह रही हैं कि मदरसा इस्लामिया और सरदारों ने सदैव देश के हितों की रक्षा की है और भारत की भूमि को अपने खून-पसीने से सींचा है और देश की आजादी का इतिहास इन्हीं बलिदानों से लाल है, इसलिए हजारों विद्वानों और मुजाहिदीनों की एक लंबी सूची है आज़ादी के उन लोगों ने जिन्होंने आज़ादी के लिए लड़ाई लड़ी। उन्होंने सभी प्रकार के बलिदान दिए और नेतृत्व की भूमिका निभाई, विशेषकर हज़रत मौलाना शाह वली अल्लाह देहलवीमौलाना शाह अब्दुल अजीज देहलवीमौलाना शाह रफ़ीउद्दीन देहलवीमौलाना शाह अब्दुल कादिर देहलवीमौलाना सैयद अहमद शहीदराय बरेलवी, मौलाना सैयद इस्माइल शहीद देहलवीमौलाना शाह इस्हाक़ देहलवीमौलाना अब्दुल हई बधान्वीमौलाना विलायत अली अजीम आबादीमौलाना जाफर थानेसरीमौलाना अब्दुल्ला सादिक पुरीमौलाना नजीर हुसैन देहलवीमुफ्ती सदरुद्दीन अजरदामुफ्ती इनायत अहमद काकुरीमौलाना फ़रीदुद्दीन शहीद देहलवी, सैयद अल-तैफा हाजी इमदादुल्लाह मुहाजिर मक्कीइमाम हुर्रियत मौलाना मुहम्मद कासिम नानोतवीमौलाना रशीद अहमद गंगोहीक़ाज़ी इनायत अहमद थानवीक़ाज़ी अब्दुल रहीम थानवीहाफ़िज़ ज़मान शहीदमौलाना रहमतुल्लाह किरणवीमौलाना फ़ैज़ अहमद बदायूँनीमौलाना अहमदुल्ला मद्रासीमौलाना फजल हक खैराबादीमौलाना रदियल्लाहु बदायूँनी, इमाम-उल-हिंद मौलाना अबुल कलाम आज़ादक्रांति के इमाम, शेख-उल-हिंद, मौलाना महमूद हसन देवबंदीमौलाना शाह अब्दुल रहीम राय पुरीमौलाना मुहम्मद अली जौहरमौलाना हसरत मोहानीमौलाना शौकत अली रामपुरीमौलाना उबैदुल्लाह सिंधीमौलाना डॉ. बरकतुल्लाह भोपाली, शेखुल इस्लाम मौलाना सैयद हुसैन अहमद मदनीमौलाना किफ़ायतुल्लाह देहलवीमौलाना सैफुर रहमान काबुलीमौलाना वहीद अहमद फ़ैज़ाबादीमौलाना मुहम्मद मियां अंसारीमौलाना उज़ैर गुल पेशावरीमौलाना हकीम नुसरत हुसैन फ़तेह पुरीमौलाना अब्दुल बारी फरंगी महलीमौलाना अबुल मुहसन सज्जाद पटनवीमौलाना अहमद सईद देहलवी, मुजाहिद मिल्लत मौलाना हिजुर रहमान सिवाहरवीमौलाना मुहम्मद मियां देहलवीमौलाना अताउल्लाह शाह बुखारी, मौलाना हबीब-उर-रहमान लुधियानवीमौलाना अहमद अली लाहौरीमौलाना अब्दुल हलीम सिद्दीकीमौलाना नूरुद्दीन बिहारीआदि आकाश हुर्रियत के टिमटिमाते तारे हैं, जिन्होंने पराधीनता की रात को रोशन किया और देश को हुर्रियत की रोशनी से भर दिया।

ये भारत में देश की राजधानी के रखवाले हैं

अल्लाह ने उन्हें उचित समय पर सचेत कर दिया 

उपर्युक्त मुजाहिदीन और विद्वान सभी इस्लामी मदरसे के लाभार्थी थे। कुछ सज्जन ऐसे भी हैं जो आधिकारिक तौर पर किसी मदरसे के स्नातक नहीं थे, लेकिन उनके साथ विद्वान जरूर थे। इनमें वे विद्वान भी हैं जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम शुरू किया था। क्या और हजरत शाह अब्दुल अजीज साहब?और फिर सैयद अहमद शहीदवे उनके नेतृत्व में काम करते रहे और उनके बाद भी संघर्ष जारी रखा। वे वे विद्वान हैं जिन्होंने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था। अबुल कलाम के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था। इन सज्जनों के बलिदान की एक झलक पाने के लिए हमें घटनाओं की शृंखला पर नजर डालनी होगी।

16वीं शताब्दी ई. के अंत में अंग्रेज व्यापारी भारत आये। 1601 में महारानी एलिजाबेथ की अनुमति से एक सौ व्यापारियों ने एक व्यापारिक कंपनी, ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना के लिए तीस हजार पाउंड का निवेश किया ।), कंपनी ने पश्चिम बंगाल को अपना मुख्यालय बनाया और डेढ़ सौ वर्षों तक अपना ध्यान केवल व्यापार पर केंद्रित रखा, लेकिन जब हजरत औरंगजेब आलमगीरऔर मुअज्जम शाह के बाद मुगल शासन की नींव कमजोर हो गई और देश में अराजकता और तवायफ-उल-मुलूकी का दौर आ गया, तब ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना मुखौटा उतार दिया और शासन व्यवस्था में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया। 1757 में प्लासी की लड़ाई में ब्रिटिश सेना खुलेआम नवाब सिराजुद्दौला के खिलाफ मैदान में उतर आई और मीर जाफर, नवाब सिराजुद्दौला के विश्वासघात के कारण पूरे बंगाल पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया। 1764 में, नवाब शुजा-उद-दौला अंग्रेजों के खिलाफ बक्सर में हार गए और बिहार और बंगाल अंग्रेजों के नियंत्रण में चले गए। 1792/ में पतुल हुर्रियत सुल्तान टीपू की शहादत के बाद अंग्रेजों ने मैसूर पर कब्ज़ा कर लिया। 1849 में पंजाब भी कंपनी के नियंत्रण में आ गया, इसी प्रकार सिंध, असम, बर्मा, अवध, रोहिलखंड, दक्षिणी दोआबा, अलीगढ़, उत्तरी दोआबा, मद्रास और पंडी चेरी आदि अंग्रेज़ों के नियंत्रण में आ गये और फिर समय ऐसा भी आया जब दिल्ली पर भी कंपनी का नियंत्रण हो गया। सरकार की स्थापना हुई

"कंपनी का युद्ध सैनिकों का युद्ध नहीं बल्कि व्यापारियों का युद्ध था, भारत को इंग्लैंड ने अपनी तलवार से नहीं बल्कि भारतीयों की तलवार से और रिश्वतखोरी, साजिश, पाखंड और दोधारी नीति अपनाकर जीता था पार्टी। उन्होंने दूसरी पार्टी से लड़कर यह देश हासिल किया। (भारत का स्वतंत्रता हेतु प्रयास, पृष्ठ 56)

देश में ईस्ट इंडिया कंपनी के बढ़ते नेटवर्क और बढ़ते प्रभाव को सबसे पहले अगर किसी ने नोटिस किया था तो वह हजरत मौलाना शाह वलीउल्लाह देहलवी थे।वे एक प्रतिभाशाली व्यक्तित्व थे, उन्होंने पूर्ण दूरदर्शिता के साथ सुधार के सिद्धांतों को समझाया, तरीका बताया और नागरिकों के मूल अधिकारों का उल्लंघन करने वाली सरकारी व्यवस्था को बाधित करने की सलाह दी और इसके लिए बल के प्रयोग पर भी जोर दिया। उनके बताए अनुसार मार्ग, उनके बेटे हज़रत शाह अब्दुलअज़ीज़ मुहद्दिथ देहलवीब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ एक व्यवस्थित संघर्ष शुरू किया, अंग्रेजों के खिलाफ एक ऐतिहासिक फतवा जारी किया और देश को युद्ध क्षेत्र घोषित किया, जो अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद की घोषणा करने के बराबर था। जनता को जागरूक करने के लिए 1818 में मौलाना सैयद अहमद शहीद हुए।मौलाना इस्माइल देहलवी, और मौलाना अब्दुल हई बधानवी के परामर्श से एक पार्टी का गठन किया गया जिसने देश के कोने-कोने में पहुंचकर धार्मिक और राजनीतिक जागरूकता पैदा की, फिर 1820 में मौलाना सैयद अहमद शहीद राय बरेलवी के नेतृत्व में मुजाहिदीन को रवाना किया गया। अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद। उन्होंने अपनी युद्ध विशेषताओं के कारण सीमावर्ती प्रांत को जिहाद का केंद्र बनाया, इसका उद्देश्य अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद था, लेकिन पंजाब के राजा अंग्रेजों के प्रति वफादार थे, इस जिहाद का विरोध करते थे और उन्हें हराने की योजना बना रहे थे। , इसलिए सबसे पहले हज़रत सैयद अहमद शहीद ने उन्हें संदेश भेजा कि "आप हमारा समर्थन करें, हम दुश्मनों (अंग्रेजों) से लड़कर देश आपको सौंप देंगे, हम देश और धन नहीं चाहते हैं" लेकिन राजा ने नहीं दिया अंग्रेजों के प्रति उनकी वफादारी बढ़ी, इसलिए उनके साथ भी जिहाद किया गया। 1831 में, हजरत मौलाना राय बरेलवी बालाकोट के मैदान में शहीद हो गए, लेकिन उनके अनुयायियों ने हिम्मत नहीं हारी, बल्कि अंग्रेजों के खिलाफ विभिन्न हिस्सों में गुरिल्ला युद्ध जारी रखा। देश। 1857 के युद्ध का/

1857/ के स्वतंत्रता संग्राम में विद्वानों ने नियमित युद्ध में भाग लिया, ये विद्वान हज़रत शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी, हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी और हज़रत सैयद अहमद शहीद की स्वर्णिम कड़ी थे, अल्लाह उन पर रहम करे। इस युद्ध के लिए विद्वानों ने लोगों को जिहाद के लिए प्रोत्साहित करने और जिहाद को बढ़ावा देने का कर्तव्य पूरा करने के लिए पूरे देश में उपदेशों और भाषणों का बाजार गर्म कर दिया और सर्वसम्मति से फतवा जारी करके जिहाद को अंग्रेजों पर अनिवार्य घोषित कर दिया। इस फतवे ने आग में घी डालने का काम किया और पूरे देश में आजादी की आग भड़क उठी। हज़रत मौलाना कासिम ननोतोवी, हज़रत मौलाना रशीद अहमद गंगोही और हाफ़िज़ ज़मान शहीद ने हज़रत सैयद अल्ताइफ़ा हाजी इम्दादुल्लाह मुहाजिर मक्की के प्रति निष्ठा की प्रतिज्ञा की, फिर तैयारी शुरू हुई, हज़रत हाजी साहब को इमाम नियुक्त किया गया, मौलाना मुनीर ननोतोवी को सेना के अधिकार के रूप में नियुक्त किया गया। बाएँ भुजा और हाफ़िज़ ज़मान थानवीमुज़फ़्फ़रनगर जेल में डाल दिया गया और मौलाना मुहम्मद क़ासिम साहब नान्तोवी को जेल में डाल दिया गयाभविष्य की रणनीति तय करने के लिए भूमिगत हो गये।

1857/ का स्वतंत्रता संग्राम विभिन्न कारणों से असफल रहा और स्वतंत्रता के पथ पर भयानक अत्याचारों के पहाड़ टूट पड़े। इनमें मुसलमान और विशेष रूप से विद्वान अंग्रेज़ों के उत्पीड़न का निशाना बने, क्योंकि उन्होंने मुसलमानों से शासन छीन लिया था और विद्वानों ने उनके ख़िलाफ़ फ़तवा जारी कर जिहाद की घोषणा कर दी थी, इसलिए 1857 से चौदह वर्ष पहले/ भारत के गवर्नर जनरल ने कहा था कि मुसलमान मूलतः हमारे विरोधी हैं। इस युद्ध में दो लाख मुसलमान शहीद हुए, जिनमें साढ़े इक्यावन हजार विद्वान भी थे। एडवर्ड थॉमसन ने गवाही दी कि अकेले दिल्ली में पाँच सौ विद्वानों को फाँसी दी गई (रिश्मी रमल पृ. 45)।

चौक जिसे मकताल के नाम से जाना जाता है

घर जीवन का एक आदर्श है     

 दिल्ली शहर शहर का हिस्सा है      

हर मुसलमान खून का प्यासा है  

दिल्ली, कलकत्ता, लाहौर, बंबई, पटना, अंबाला, इलाहाबाद, लखनऊ, सहारनपुर, शामली और पूरे देश में मुसलमानों और अन्य उत्पीड़ित भारतीयों की लाशें देखी जाती थीं। ऐसा किया जाता था, कभी-कभी सूअर की चर्बी मिलाई जाती थी उनके शरीर पर और फिर उन्हें जिंदा जला दिया गया। (ईस्ट इंडिया कंपनी और विद्रोही विद्वान देखें)

इस युद्ध की विफलता का मुख्य कारण लोगों और संसाधनों की कमी और संगठन की कमी थी, इसलिए अकबर देवबंद ने 1866 में देवबंद में दार उलूम देवबंद की स्थापना की। इसलिए, ऐसे व्यक्तियों और पुरुषों की भी तैयारी की गई जो राष्ट्र का नेतृत्व कर सकें। और देश आजादी की मंजिल तक सफलतापूर्वक पहुंचे। इसलिए, दारुल उलूम के पहले छात्र, जो स्नातक होने के बाद दारुल उलूम के शिक्षक और अध्यक्ष बने, को एक अवसर मिला। लेकिन उन्होंने कहा:

"हज़रत अल-इस्ताज़ (हज़रत नानोतवी)) शिक्षण, शिक्षा और सीखने के लिए इस मदरसे की स्थापना की? जहां तक मेरी जानकारी है, मदरसे की स्थापना मुझसे पहले 1857 के दंगों की विफलता के बाद की गई थी/इस इरादे से कि इसके प्रभाव में आने वाले लोगों को 1857 की क्षतिपूर्ति के लिए तैयार करने के लिए एक केंद्र स्थापित किया जाए" (रिसाला दारुल उलूम नं. जुमादी) अल-थानी 1372 एएच)

यह पाया गया कि देश की सेवा और उसकी स्वतंत्रता की भावना दारुल उलूम देवबंद की स्थापना के मुख्य उद्देश्यों में से एक है, साथ ही मदरसों की स्थापना का उद्देश्य भी है जो बाद में दारुल उलूम की तर्ज पर स्थापित किए गए। ऐसे व्यापारियों और लोगों को तैयार करना रहा है जो देश के निर्माण और विकास में प्रभावी भूमिका निभा सकें, फिर अकबर दारुल उलूम देवबंद ने निर्माण और विकास के लिए व्यापक स्तर पर संघर्ष के लिए जामिया उलेमा हिंद की स्थापना की जो दारुल उलूम की राजनीतिक संस्था है। देश के। बाज़ो थे, अकबर जमीयत ने लोगों के बीच जागरूकता की लहर पैदा करने और माहौल को आजादी के लिए अनुकूल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जमीयत और कांग्रेस के मंच से, और मौलाना मुहम्मद अली जौहर और मौलाना द्वारा प्रदान की गई सेवाएं आजादी के लिए हसरत मोहानी आदि दिन की तरह स्पष्ट हैं।

यहां क्रांति के इमाम हजरत शेख उल हिंद मौलाना महमूद हसन साहब देवबंदी थेउन्होंने अपने साथियों के साथ जो स्वतंत्रता आंदोलन शुरू किया था, उस पर प्रकाश डालना उचित होगा। यह आंदोलन रेशम रूमाल आंदोलन के नाम से जाना गया। सबसे पहले हजरत शेख अल-हिंद ने फजला देवबंद के एक संगठन समारा-उल-तरबिया की स्थापना की। , फिर उन्होंने जमीयत अंसार की स्थापना की और इसके तहत फजला को समन्वित और संगठित और प्रवृत्त किया गया। सैयद अहमद शहीद के आंदोलन का प्रभाव वहां रहा। हजरत शेख उल हिंद ने इस क्षेत्र को अपने आंदोलन का केंद्र बनाया। कार्यक्रम इस क्षेत्र को भरने का था। जिहाद के लिए उत्साह और अफगानिस्तान की सरकार को भारतीय स्वतंत्रता के मुजाहिदीन के साथ सहयोग करने के लिए राजी करना। क्रे और तुर्की सरकार से संपर्क करके उसे भारत में ब्रिटिश सरकार पर हमला करने के लिए तैयार करना। और देश में विद्रोह और क्रांति की आग भड़का दी जाए और ब्रिटेन को आंतरिक और बाहरी हमलों से मजबूर कर दिया जाए भारत छोड़ने को मजबूर किया गया. इसके लिए हजरत शेख उल हिन्द ने देश में दिल्ली, लाहौर, पानीपत, दीनपुर, अमृत, कराची, आत्मानजई, ढाका आदि को केन्द्र बनाया, मिशन की सफलता के लिए बर्मा, चीन, फ्रांस और अमेरिका में प्रतिनिधिमण्डल भेजे और अपने समर्थन मिला. उन्होंने मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी को काबुल में रहकर अपनी सेवाएँ करने का आदेश दिया और वे स्वयं हिजाज़ मक़दिस चले गए ताकि ओटोमन ख़लीफ़ा के अधिकारियों से मिल सकें और तुर्की को ब्रिटिश सरकार पर हमला करने के लिए राजी कर सकें। इसलिए हज़रत ने गवर्नर ग़ालिब पाशा से मुलाकात की, उन्होंने पूरी ताकत लगा दी। तुर्की के सहयोग और युद्ध मंत्री अनवर पाशा ने मदीना में हज़रत शेख अल-हिंद से भी मुलाकात की और तुर्की के युद्ध मंत्री ने अपने पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया। इस आंदोलन में मौलाना सिंधी ने रेशम के रूमाल पर एक गुप्त पत्र बनाया, इसलिए इसे रेशम रूमाल आंदोलन कहा गया। इस आंदोलन के सदस्यों और समर्थकों में हज़रत शेख उल हिंद के अलावा शेख इस्लाम मौलाना भी थे हुसैन अहमद मदनी, मोवाना ओबैदुल्ला सिंधी, हाजी तुरंगजई, मौलाना अबुल कलाम आजाद, मौलाना अब्दुल रहीम राय पुरी, मौलाना खलील अहमद सहारनपुरी, मौलाना सादिक कराचोवी, खान अब्दुल गफ्फार खान सरहदी, मौलाना अहमद अली लाहौरी, मौलाना हसरत मोहानी, मोवाना मुहम्मद अली जौहर , मौलाना उज़ैर गुल, मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली, और आंदोलन के गैर-मुस्लिम सदस्यों में राजा महेंद्र प्रताप सिंह, डॉ. मथुरा सिंह, एपीपी आचार्य आदि शामिल थे। आंदोलन का रहस्य उजागर होने और हजरत शेख-उल-हिंद की गिरफ्तारी के कारण आंदोलन की सफलता में गिरावट जारी रही, लेकिन आंदोलन ने हिंदू-मुस्लिम एकता के साथ स्वतंत्रता संग्राम लड़ने के लिए एक मजबूत आधार स्थापित किया। हजरत शेख उल हिंद की दूसरी उपलब्धि यह है कि उन्होंने खिलाफत कमेटी और जमीयत उलेमा हिंद के मंच और फंड से गांधीजी को पूरे देश का दौरा कराया और साथ में आजादी की लड़ाई में भाग लेने का निर्णय लिया। आजाद, मौलाना अब्दुल रहीम राय पुरी, मौलाना खलील अहमद सहारनपुरी, मौलाना सादिक कराचवी, खान अब्दुल गफ्फार खान सरहदी, मौलाना अहमद अली लाहौरी, मौलाना हसरत मोहानी, मोवाना मुहम्मद अली जौहर, मौलाना उजैर गुल, मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली, और गैर-मुस्लिम सदस्य आंदोलन के राजा महेंद्र प्रताप सिंह, डॉ. मथुरा सिंह, एपीपी आचार्य आदि शामिल थे. आंदोलन का रहस्य उजागर होने और हजरत शेख-उल-हिंद की गिरफ्तारी के कारण आंदोलन की सफलता में गिरावट जारी रही, लेकिन आंदोलन ने हिंदू-मुस्लिम एकता के साथ स्वतंत्रता संग्राम लड़ने के लिए एक मजबूत आधार स्थापित किया। हजरत शेख उल हिंद की दूसरी उपलब्धि यह है कि उन्होंने खिलाफत कमेटी और जमीयत उलेमा हिंद के मंच और फंड से गांधीजी को पूरे देश का दौरा कराया और साथ में आजादी की लड़ाई में भाग लेने का निर्णय लिया। आजाद, मौलाना अब्दुल रहीम राय पुरी, मौलाना खलील अहमद सहारनपुरी, मौलाना सादिक कराचवी, खान अब्दुल गफ्फार खान सरहदी, मौलाना अहमद अली लाहौरी, मौलाना हसरत मोहानी, मोवाना मुहम्मद अली जौहर, मौलाना उजैर गुल, मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली, और गैर-मुस्लिम सदस्य आंदोलन के राजा महेंद्र प्रताप सिंह, डॉ. मथुरा सिंह, एपीपी आचार्य आदि शामिल थे. आंदोलन का रहस्य उजागर होने और हजरत शेख-उल-हिंद की गिरफ्तारी के कारण आंदोलन की सफलता में गिरावट जारी रही, लेकिन आंदोलन ने हिंदू-मुस्लिम एकता के साथ स्वतंत्रता संग्राम लड़ने के लिए एक मजबूत आधार स्थापित किया। हजरत शेख उल हिंद की दूसरी उपलब्धि यह है कि उन्होंने खिलाफत कमेटी और जमीयत उलेमा हिंद के मंच और फंड से गांधीजी को पूरे देश का दौरा कराया और साथ में आजादी की लड़ाई में भाग लेने का निर्णय लिया। मोहनी, मोवाना मुहम्मद अली जौहर, मौलाना उजैर गुल, मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली और आंदोलन के गैर-मुस्लिम सदस्यों में राजा महेंद्र प्रताप सिंह, डॉ. मथुरा सिंह, एपीपी आचार्य आदि शामिल थे। आंदोलन का रहस्य उजागर होने और हजरत शेख-उल-हिंद की गिरफ्तारी के कारण आंदोलन की सफलता में गिरावट जारी रही, लेकिन आंदोलन ने हिंदू-मुस्लिम एकता के साथ स्वतंत्रता संग्राम लड़ने के लिए एक मजबूत आधार स्थापित किया। हजरत शेख उल हिंद की दूसरी उपलब्धि यह है कि उन्होंने खिलाफत कमेटी और जमीयत उलेमा हिंद के मंच और फंड से गांधीजी को पूरे देश का दौरा कराया और साथ में आजादी की लड़ाई में भाग लेने का निर्णय लिया। मोहनी, मोवाना मुहम्मद अली जौहर, मौलाना उजैर गुल, मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली और आंदोलन के गैर-मुस्लिम सदस्यों में राजा महेंद्र प्रताप सिंह, डॉ. मथुरा सिंह, एपीपी आचार्य आदि शामिल थे। आंदोलन का रहस्य उजागर होने और हजरत शेख-उल-हिंद की गिरफ्तारी के कारण आंदोलन की सफलता में गिरावट जारी रही, लेकिन आंदोलन ने हिंदू-मुस्लिम एकता के साथ स्वतंत्रता संग्राम लड़ने के लिए एक मजबूत आधार स्थापित किया। हजरत शेख उल हिंद की दूसरी उपलब्धि यह है कि उन्होंने खिलाफत कमेटी और जमीयत उलेमा हिंद के मंच और फंड से गांधीजी को पूरे देश का दौरा कराया और साथ में आजादी की लड़ाई में भाग लेने का निर्णय लिया। इस आंदोलन ने हिंदू-मुस्लिम एकता के साथ स्वतंत्रता संग्राम लड़ने की मजबूत नींव स्थापित की। हजरत शेख उल हिंद की दूसरी उपलब्धि यह है कि उन्होंने खिलाफत कमेटी और जमीयत उलेमा हिंद के मंच और फंड से गांधीजी को पूरे देश का दौरा कराया और साथ में आजादी की लड़ाई में भाग लेने का निर्णय लिया। इस आंदोलन ने हिंदू-मुस्लिम एकता के साथ स्वतंत्रता संग्राम लड़ने की मजबूत नींव स्थापित की। हजरत शेख उल हिंद की दूसरी उपलब्धि यह है कि उन्होंने खिलाफत कमेटी और जमीयत उलेमा हिंद के मंच और फंड से गांधीजी को पूरे देश का दौरा कराया और साथ में आजादी की लड़ाई में भाग लेने का निर्णय लिया।

इस मौके पर शेखुल इस्लाम मौलाना हुसैन अहमद मदनी को सलाम करना भी नुकसानदेह है, उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी हजरत शेखुल हिंद के नक्शेकदम पर चलकर देश की आजादी और विकास में जमीयत और कांग्रेस के मंच से बिताई।1920 में जमीयत उलेमा-ए-हिंद की आम बैठक में यह निर्णय लिया गया कि ग्रेट ब्रिटेन की सरकार के साथ सभी संबंध और समर्थन और पक्ष के मामले वर्जित हैं। मानद पद छोड़ दिए जाने चाहिए (2) परिषदों में सदस्यता छोड़ दी जानी चाहिए (3) धर्म के दोशमनों को अंग्रेजों को व्यावसायिक लाभ पहुँचाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए (4) स्कूलों और कॉलेजों में सरकारी सहायता स्वीकार नहीं की जानी चाहिए (5) धर्म के शत्रुओं की सेना में रोजगार वर्जित माना जाना चाहिए। जाओ (6) 1921/जुलाई में कराची में खिलाफत बैठक में मामलों को सरकारी अदालतों में नहीं ले जाया जाना चाहिए, हजरत मदनी ने भी कहा।उपरोक्त प्रस्तावों की घोषणा की जिसका मौलाना मुहम्मद अली जौहर, डॉ. सैफुद्दीन कुचलू आदि ने समर्थन किया, जिसके परिणामस्वरूप हज़रत मदनीआदि को 26/ सितम्बर 1921/ को कराची कोर्ट में गिरफ्तार कर लिया गया, हजरत मदनी ने पूरी निडरता और साहस के साथ एक लम्बा बयान दिया और उपरोक्त बातों को दोहराया और कहा कि यदि सरकार चाहे तो ब्रिटिश सरकार की सेना में नौकरी करना वर्जित है। हमारी धार्मिक स्वतंत्रता छीन लो। लेकिन अगर वह तैयार हो गया, तो मुसलमान अपने जीवन का बलिदान देने के लिए तैयार होंगे और मैं पहला व्यक्ति होऊंगा जो अपने जीवन का बलिदान देगा। मुहम्मद पृष्ठ 115)

जामिया के मंच से मौलाना अब्दुल बारी फिरंगी महली और वे महान विद्वान जिन्होंने आजादी और फिर देश के विकास के लिए उज्ज्वल सेवाएँ कीं।मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, मुफ्ती किफायतुल्लाह देहलवीमौलाना सज्जाद बिहारीमौलाना सैयद सुलेमान नदवीअल्लामा अनवर शाह कश्मीरीमौलाना शब्बीर अहमद उस्मानी, शाह मोइनुद्दीन अजमेरीमौलाना अब्दुल हक मदनीमौलाना सैयद मुहम्मद मियां देवबंदी, मौलाना हुफजुर रहमान सिवाहरवीमौलाना फखरुद्दीन अहमद मुरादाबादीमौलाना अहमद सईद देहलवी, आदि नाम शामिल हैं.#

इस बज़्म जिन्न के दीवाने हर रास्ते से यज़्दान तक पहुंचे

देवर चमन से ज़िंदन तक हमारी कहानियाँ आम हैं   

देश की आजादी के लिए बलिदान देने वाले इस्लामी विद्यालयों के महान विद्वानों की सेवाओं की एक झलक पेश की गई और "लज़ीज़ बड हकैत दराज़ तर गफ़तिम" के तहत थोड़ा अहंकार के साथ प्रस्तुत किया गया। सच तो यह है कि विद्वानों ने ही इसे सींचा और पोषित किया है। जिहाद आज़ादी का चमन अपने खून और जिगर से।

वक्त आया तो हमने गुलास्तां को खून दिया

जब वसंत आता है , तो वे कहते हैं कि पानी नहीं है       

क्या किया होगा, सत्ता के सरदारों और सांप्रदायिक तत्वों का नाम लेना ठीक नहीं है, लेकिन अपने देश और राष्ट्र के नायकों, इन मुजाहिदीनों और उनके इतिहास और उपलब्धियों को श्रद्धांजलि देना हमारी अपनी ज़िम्मेदारी है। उन्हें जानें और उनके जीवन को अपने लिए प्रकाशस्तंभ बनाएं। वह।

ये हैं वो सूरमा, ये हैं मुजाहिदीन, ये हैं फ़ैज़ से, जिनसे ये देश आज़ाद है

चलो हम उन्हें भूल जाएं, ये खूबसूरत नहीं है, ये देश उनके जज्बातों से आबाद है

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दारुल उलूम मासिक, अंक 9, खण्डः 90, 

             बहुत बहुत शुक्रिया 

आपका दोस्त साथी लेखक - MURAD KHAN 
         JAI HIND JAI BHARAT 











मुसलमान कयादत से महरूम!!

                           मुसलमानों की कयादत !! 

 

जी हां दोस्तों जी हां दोस्तों है सलाम व आदाब ।आज बात मुसलमानो की हो रही है। हिंदुस्तान आजाद हुए को 75 साल हो गए चुके हैं, लेकिन हिंदुस्तान के अंदर मुसलमानों के राष्ट्रीय स्तर पर लीडरशिप या कयादत कभी उभर ही नहीं सकी । हिंदुस्तान के मुसलमानो ने कुछ हद तक मौलाना अब्दुल कलाम आजाद को एक सियासी लीडर्स जरूर माना था , मगर बड़े तबके ने उसे शख्सियत की लीडर खारिज कर दिया था,जिसकी प्रमुख वजह है मुसलमान के अंदर फिरका परस्थिति ।आज भी मुसलमान फिरका वरियत में बंटे हुए हैं, जिसे उनका सियासी और मजहबी लीडर राष्ट्रीय स्तर पर अभी तक मुस्लिम अवाम को एक प्लेटफार्म पर नहीं ला सका। हालांकि कुछ हद तक जमीयत  उलमा और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसी संस्थाओं ने अहम भूमिका अदा की है। मुसलमानों के हर दुख और सुख में हमेशा खड़े रहे ,किसी भी तरह से मुस्लिम आवाम की बाढ़ जैसे हालात में ,या दंगे के वक्त ,और भी परिस्थति सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट का मामला हो ,जमीयत ने फिर्का परस्ती से ऊपर उठ कर काम किया है । कुछ हद तक वह संस्थाएं नाकाम साबित रही है । मगर हिन्दुस्तान की मुख्तलिफ रियासतों में देखा जाए  तो केरला रियासत के अंदर मुस्लिम लीग की  कयादत रही है ,हैदराबाद में ए आई एम आई एम पार्टी की कयादत  कर रही है । असम के अंदर मुखलिफिन माहौल के अंदर मौलाना बद्रुदीन अजमल साहब कयादत कर रहे हैं, लेकिन उसके अलावा और शुबो के अंदर बहुत ही गिने चुने मुस्लिम लीडर है जो मुसलमान की छोटे स्तर पर कयादत  कर रहे हैं । लेकिन यह सब एक नाकाम कोशिश से नजर आ रही हैं ।हालांकि इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर ए आई एम आई एम पार्टी जिसके मुखिया असदुद्दीन ओवैसी साहब अपने सूबे से बाहर निकाल कर हिंदुस्तान की मुख्तलिफ रियासतों में जाकर मुसलमान के हुकूक की बात कर रहे हैं,हालांकि वो भी काफी हद तक नाकाम साबित रहे है ,हालांकि ओवैसी साहब पक्के और सच्चे ईमानदार शख्सियत है , उसके बावजूद भी मुसलमान उसको अपना लीडर नहीं मान रहे हैं, जिस की वजह  मुसलमान काफी लंबे वक्त से दूसरी कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियों में उनकी जड़ें मजबूत टिकी हुई है इसलिए बड़े लीडर ओवैसी से हाथ नही मिलाते हैं।

इसलिए मुस्लमान लीडरों से बड़ी इल्तिजा है की वो सियासी और मजहबी लीडरशिप फिरका प्रस्ति से ऊपर उठ कर सारे मसलक के रहनुमा आवाम की रहनुमाई करते हुए सारे लीडर एक प्लेटफार्म पर जमा हो ,फिर आवाम उन सब को रहनुमाई को मंजूर करे ।


मुसलमानों की कयादत मजबूत नहीं होने की वजह से बहुत सारे मुस्लमान विकास, और इंसाफ से महरूम रह जाते हैं  मुसलमानो का सियासत में हिस्सा बिलकुल न के बराबर होना ,जिससे उनका बैकग्राउंड बिछड़ता चला जा रहा है। इससे हमारी कॉम में पसमंजर और ना इंसाफी का माहोल नजर आता है ।

हम आवाम को चाहिए की हमें अपने अंदर झांकना होगा और दुनिया के माहौल को देखना होगा कि हम मुस्लिम कहां पर खडे है और हमारा क्या हाल है ,और हमारी कॉम और समुदाय का क्या हाल है ,उनके साथ क्या हो हो रहा है ये सब आप लोग आज कल सोसल मीडिया पर देख और सुन रहे हो ,कोई मजलूम मुसलमानों की आवाज उठा रहा है? तो अलर्ट हो जाइए और अपनी कयादत को मजबूत कीजिए ,सियासत में हिस्सा लीजिए और वोट देने वाले नहीं बल्कि वोट लेने वाले बनिए।

हां जी और ये भी कहना चाहता हु ,अगर आप लोग मजहब से ऊपर उठ कर सियासी लीडर अपना नही कायम करेंगे तब तक आप की सुनने वाला कोई नहीं होगा ,जो भी आप के लिए मुल्क के अंदर आवाज उठा
 रहा है उसका साथ दीजिए ,और उसकी कयादत को स्वीकार कीजिए चाहे उसकी जाति या समुदाय कोई भी
 हो , फिरका prsti से ऊपर उठ कर काम कीजिए।अपना ही लीडर 
बिना निषपक्ष से आप की आवाज को सदन में या सोशल मीडिया में उठाता हैं जरूर उसकी बात का असर पड़ता 
है ।

                     धन्यवाद दोस्तों 
         आप का साथी, लेखक मुराद खान  
               जय हिन्द जय भारत 



Who's reality leader of Muslim?मुसलमानों का असली लीडर कौन?

                                                             














   हिन्दुस्तान के मुसलमानो का असली लीडर ?                                                                                 दोस्तों सलाम व आदाब हिन्दुस्तान के मुसलमानों का असली लीडरशिप कौन है?वैसे तो हमारा असली लीडर अल्लाह रब्बुल करीम है, फिर भी धरातल पर हमारा कोई वजूद नहीं है, इसके लिए हम स्वंय ज़िम्मेदार हैं,क्योंकि देश को आजाद कराने के बाद से अब तक हमने हमारा असली लीडर चुना ही नहीं, हमारे कायदीन कांग्रेस पार्टी को मजबूत किया , और हिन्दुस्तान की मुख्तलिफ रियासतों में अलग अलग पार्टियां है जिसे  सपा, बसपा, टीएमसी, केसीआर, आरजेडी, मुसलिम लीग है और भी क्षेत्रीय स्तर की राजनीतिक पार्टियां है। मुसलमानों ने उन पार्टियों के मुस्तकबिल को चमकाया मगर खुद के मुस्तकबिल की परवाह ही नहीं की ! बड़े अफसोस की बात है । कुछ हद तक नतीजा जरूर निकला जो आशा और उम्मीद के मुताबिक जो काम होना था वो नहीं हो पाया।

 गैरो को असली लीडर मानते रहे और उनको बार बार सियासत के मैदान मैं चमकाते रहे मगरर अपने वजूद केलिये। कुछ नहीं कर पाएं। हमने सत्तर साल बाद भी अपने गिरेबान में झांक कर देखा ही नहीं, ये गलती उनकी नहीं ये गलती हमारी है , हमने उन आकाओं पर विश्वास किया कि हमारे लिए भी होगा।लेकिन एक कहावत है न" जब तक बच्चा रोता नहीं मां दूध नहीं पिलाती" । इसी वजह से हम हर क्षेत्र मैं पिछड़ रहे हैं, शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थीक और राजनीतिक क्षेत्र हो या सामाजिक क्षेत्र हो,पर हम हर स्तर पर पिछड़ते रहे। यहां तक कि हमारा पंचायत समिति या तहसील में चपरासी स्तर का आदमी नही है । हमने औरों के भविष्य को बनाया मगर अपने भविष्य पर कभी ध्यान ही नही दिया ।
              पिछड़े के मुख्य दो कारण है    

एक तो दुनियादारी के ऐतबार से ,दूसरे हम दीन के ऐतबार से।

दूनियादारी के ऐतबार से हम अपने राजनीतिक पार्टियों पर विश्वास करके बैठे रहे मगर आजतक हम अपने आप को जगा नहीं पाए।इसके ज़िम्मेदार कुछ हद तक हम खुद काफी हद तक राजनीतिक पार्टियां है।

दूसरा कारण है हम अपने दीन पर सच्चाई और ईमानदारी पर नहीं चल पा रहे हैं जिसके पिछड़ने का मुख्य कारण यही है।आज हमारे मुआशरों मे झूठ, दगाबाज, फरेब,खयानत, मोजमस्ती ,सोशल मीडिया, फालतू खर्च, गाली गलोच , छोटी मोटी बातों पर झगड़ा ,शिक्षा पर बिलकुल ध्यान नहीं होना इस कार्यों में व्यस्त रहे मगर अभी -भी हम जागे नहीं।हमने हमारे मज़हब को सच्चाई, अमानतदार,ईमानदारी सुन्नते रसूल पर हम चले ही नहीं जिसकी वजह से हम पिछड़ रहे हैं

राजनीति के क्षेत्र मे हमारा असली नेता किसको चुने और कैसे चुने?
आज राजनीति के क्षेत्र मैं ऐसे शख्स को चुने जो आपके मुस्तकबिल और समाज के फिक्रमंद आदमी होना चाहिए। इसके अलावा हमारे नेता के अंदर सच्चाई ,अमानतदारी,ईमानदारी और नेकदिल इन्सान होना ही चाहिए तभी अपने कौम का भला होगा । हमें ऐसे लीडर को चुनना जरूरी है।


हालांकि वो हमारी कौम के लिए हर समय आवाज को उठाता है । संविधान के दायरे में रह कर बात करता है, अपनी बात को खुल कर पैश करता है, अल्लाह के सिवा किसी से डरता नहीं है।अपने हक और इंसाफ़ के लिए संघर्ष करता है, शरियत की हिफाजत करता है, तो आप भी मेरी बात को समझ गए हैं कि मैं किसके बारे मैं कहना चाहता हूँ।ऐसा  शख्स शायद ही हिन्दुस्तान के  अंदर मौजूद हों!हिन्दुस्तान के अंदर बहुत सारे मुसलमान लीडर है मगर उनके  बेबाक ,बेखोफ, और बेदाग जैसा शायद ही कोई ओर नेता होगा।

तो हिन्दुस्तान के मुसलमानों को ऐसा लीडर चुनना होगा तभी मुसलमानों के हुकुक की बात सुनी जाएगी।हालांकि ओवैसी शख्सियत किसी एक समुदाय की आवाज नहीं बल्कि दलित एंव शोषित वंचित समाज की भी बात करता है। देश के हर नागरिक जी के खिलाफ जुल्म होता है उनके पक्ष में बात जरूर करते है । हिंदुस्तान की पार्लियामेंट में आवाज उठाते हैं ।हिन्दुस्तान की तरक्की पसंद और इंसाफ पसंद नेता की अति आवश्यक जरूरत है, इसमें कोई दो राय नहीं है।
हमारा असली लीडर कौन? 
लीडर और नेता कोई मां के पेट से पैदा नहीं होते है,हमें उनको बनाना पड़ता है , जो व्यक्ति संघर्ष करके महान बनता है , उनको लीडर अपने को मानना पड़ेगा ।जिस क्षेत्र में,या जिस शहर में काबिल इंसान है ,उसको चाहिए की अपनी समाज की ओर समुदाय की रहबरी करे, उनके दुख सुख में साथ खड़ा रहे और उनके साथ हक और इंसाफ के साथ मामला करवाए । आप सी मामलात भी ठीक करवाए ।
असली लीडर वो है जो ईमानदार, सच्चाई,अमानतदार, इंसाफ पसंद , अनुभवी,जागरूक , साहसी,ये सब आप के लीडर में खूबियां होनी चाहिए। ऐसे आदमी को आप अपना कायिद चुने। आप का कायिद बिना निस्वार्थ के आप का समाज हित में काम करता हो । असली लीडर वही जो आप के साथ सुख और दुख में हमेशा अग्रिम पंक्ति में खड़ा रहता है । वही आप का असली लीडर है ।

                        🙏धन्यवाद🙏

      आप का साथी ,दोस्त  -  लेखक                       मुराद खान 














हर घर तिरंगा अभियान

      


 






      हर घर तिरंगा अभियान - श्री नरेन्द्र मोदी

ALL ARE INDIAN HAPPY INDIPENDENT                                 DAY

जैसा कि आप को पता है की  हमारे देश भारत  को आजाद हुए 75 साल पूरे हो चुके हैं। अमृत महोत्सव का अंतिम पड़ाव है। हमारे मुल्क की केन्द्र सरकार जिसके प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने एक अभियान चलाया है की हमारा मुल्क अंग्रेजों की गुलामी से काफी संघर्ष से आजाद हुआ है , हमारे मुल्क को आजाद हुए को 75 साल पूरे हो चुके हैं , यानी अमृत महोत्सव समापन की ओर है,जिससे सभी हिंदुस्तानियों को हर घर पर तिरंगा झंडा फहराने की अपीली कर रहे हैं,और सोशल मीडिया पर पुरजोर तरीके से अपील की जा रही है।  जिससे हर भारतीय अपनी शान शौकत से अपनी दुकान , घर,होटल और ऑफिस और अन्य संस्थान पर बड़े गर्व से फहरा रहा है। हालंकि राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा हमारे लिए बड़ी शान वाला है ये हमारे लिए फख्र की बात है ।जब हम लोग राष्ट्र के प्रतीको को देखते है तो बहुत ही हमारे अंदर एक गर्व की भावना जागृत होती है । यकीनन हमें इन राष्ट्रीय प्रतिको का आदर और सम्मान करना चाहिए।

                    धन्यवाद दोस्तों

आप का साथी - WRITER : MURAD KHAN 

            JAI HIND - JAI BHARAT 












 

हिंदुस्तानी मुसलमानो पर ज़ुल्म क्यों?

 हिंदुस्तानी मुसलमानो पर ज़ुल्म क्यों?

जी हां दोस्तों आज बात हिंदुस्तान के मुसलमानो की हो रही है। जी दोस्तों हिंदुस्तान को आजाद होने में आज लगभग 75 वर्ष पूरे हो चुके हैं। उससे पहले हमारा मुल्क अंग्रेजों का गुलाम था,अंग्रेजों ने हमारे मुल्क पर ढाई सौ साल कब्जा किया था जिससे 1757 से लेकर 1947 तक हिंदुस्तानियों ने अंग्रेजों को शिकस्त दी।

हमारा मुल्क 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ और हिंदुस्तान 26 जनवरी 1950 को एक गणतंत्र राष्ट्र बना, जिसे हमारे बुजुर्गों ने एक ख्वाब बुना था, उस ख्वाब को पूरा किया। हिंदुस्तान दुनिया का एक ऐसा वाहिद मुल्क है जिसमें सभी मजहब और पंथ को मानने वाले इस मुल्क में रहते हैं,इसलिए भारत एक विविधता का देश है। जिसकी एक खासियत है अनेकता में एकता।

हमारे देश में हिंदू मुसलमान सिख इसाई जैन बौद्ध पारसी और अन्य सभी धर्म के लोग रहते हैं।सभी मजहब के लोग इतने वर्षों तक एक साथ रहते आए, एक दूसरे के दुख सुख में साथ रहे कभी कोई किसी को दिक्कत नहीं।  लेकिन कुछ वर्षों से हमारे मुल्क के अंदर एक ऐसा असामाजिक  तत्वों द्वारा माहौल बनाया गया की इस मुल्क के अंदर रहने वाले भाईचारे को हिंदू और मुसलमान के बीच जो प्रेम और मोहब्बत का रिश्ता है, उसे रिश्ते को कैसे तोड़ा जाए और तोड़ने का मकसद यह है की हमें तख्त ओ ताज हासिल करना। इस कोशिश  मैं तकरीबन कुछ हद तक असामाजिक तत्व कामयाब हुए हैं ।इस बात पर हमें बहुत बड़ा अफसोस है, कि हमारे देश को एक आग की भट्टी में धकेला जा रहा है। किसी न किसी एक धर्म को ,किसी एक इंसान को या की दलित जाति के इन्सान को या कभी हिंदू और मुसलमान को निशाना बनाया जा रहा है जिस देश की विविधता में एकता वाली मिसाल अब बिखरती नजर आ रही है।

हमारे मुल्क की सरकारें बड़े-बड़े दावे करती है कि हिंदुस्तान एक विश्व गुरु  बनने जा रहा है लेकिन दूसरी तरफ भारत के अंदर रहने वाले शहरी सुरक्षित नहीं है।जिन्होंने अपने मुल्क को आजाद करवाने  में बड़ी कुर्बानियां दी। उन्हीं के ऊपर अत्याचार किया जा रहा है, और उन को निशाना बनाया जा रहा है । यहां तक कि उनसे राष्ट्र का सर्टिफिकेट मांगा जा रहा है इसके पीछे एक बहुत बड़ी ताकत है संगठन है जो देश को बर्बादी की ओर ले जा रहा है यह हमारे मुल्क के लिए तरक्की नहीं बल्कि एक विनाश का रास्ता है इससे भारत अखंड भारत या भारत गुरु नहीं बन पाएगा, बल्कि भारत के टुकड़े टुकड़े हो सकते हैं इसमें कोई शक नहीं अगर इस तरह की हरकतें होती रही तो।


 मुसलमानों पर जुल्म के प्रमुख कारण

1. मुत्ताहिद ना होना

हिंदुस्तान के मुसलमान आज भी फिरका वॉरीअरियत में बंटे हुए हैं। जिसे मुसलमान एक प्लेटफार्म पर नहीं आते हैं। किसी शहर में या किसी सूबे में किसी मुसलमान पर जुल्म होता है तो उसके खिलाफ कोई नही बोलता है ।जिससे  जालिमों के खिलाफ न तो और मुसलमान बोलते ही और न ही वहां की सरकार कुछ करती है ,सिर्फ और औपचारिकता पूरी करके कुछ दिनों बाद नाइंसाफी करने वाले को छोड़ देते है। उसे सरकार के खिलाफ या उन लोगों के खिलाफ या उनके रिश्तेदार आवाज उठाते हैं या उनका कोई मुसलमान सच्चा नेक वही आवाज उठाता है। लेकिन बाकी कोई उनका नुमाइंदा या प्रतिनिधि आवाज नहीं उठाता है चाहे वो मुसलमान हो या कोई गैर मुस्लिम हो ,कोई नहीं बोलते हैं ,क्योंकि उनकी सरकार को उनके प्रतिनिधियों को सब पता है कि मुसलमान आपस में एक एकजुट नहीं है इसलिए मुसलमानों के ऊपर जुल्म हो रहे हैं। 

2. मुसलमानों का सियासत में  हिस्सा न होना

हिंदुस्तान के अंदर आज तक मुसलमानो की कोई राष्ट्रीय स्तर की पार्टी या कोई दल है ही नहीं जो मुसलमानो के मसले मसाइल की आवाज उठा सके ।  क्यों की मुसलमानो ने अपनी जागीदा राष्ट्रीय लेवल पर कांग्रेस अपना अब कुछ मा और बाप मान लिया और इसी पर भरोसा करने लगे ,इस बूढ़े मां और बाप से परे जाकर कभी सोचा ही नहीं बस अंधों की तरह विश्वास कर लिया । बाकी राज्यों में बीजेपी के अलावा जो भी राजनीतिक दल है उनके ऊपर भरोसा करके बैठे है। यहां तक कि कभी भी मुस्लिम आवाम ने अपने हक और इंसाफ के लिए सरकार से मुतालबा नही किया इसलिए सरकार ने जो दिया वो लिया और जो नही दिया उससे वो महरूम रह गए बेचारे । जाहिर सी बात है की बच्चा रोता है तो मां दूध पिलाती है , वरना मां अपने काम में व्यस्त है ।मुसलमानों की  राजनीति हैसियत  में बहुत ही न के बराबर अनुपात है जिसे मुसलमान की आवाज एवं इवान ए असेंबली में नहीं सुनाई देती है सरकार को।

3. मुसलमान शिक्षा में पिछड़ा हुआ।

हिंदुस्तान में मुसलमान की आबादी 25 फ़ीसदी है लेकिन शिक्षा में अनुपात मात्र चार फीसदी है। जिसे मुसलमान का बड़ा तबका  शिक्षा में दुनिया की तालीम और दीनी तालीम में पिछड़ा हुआ है ।इससे उनके ऊपर हो रही जुल्म के खात्मे  को मिटाने के लिए उनके पास शिक्षा जैसा  बड़ा हथियार नहीं होने की वजह से जागरूकता नहीं है ,जिसे मुसलमान अक्सर जुल्म का शिकार हो रहा  हैं, इसलिए हमें चाहिए की अपने बच्चों को और बच्चियों को दीनी और दुनियावी तालीम से जोड़ें।

4. मुसलमान आर्थिक स्थिति में पिछड़ा हुआ।

हिंदुस्तान के मुसलमान आर्थिक दृष्टि से बहुत पिछड़े हुए हैं । क्योंकि उनके पास व्यापार या पैसा इन्वेस्ट  करने की जानकारी नहीं होने की वजह से मुसलमानों की आर्थिक स्थिति बहुत ही कमजोर है ,जिससे भारत का अकसर मुसलमान तबका गरीब है ,गरीब इसलिए है क्योंकि उनके पास सही जगह पर सही वक्त पर पैसा खर्च करने का कोई प्लान ही नहीं है । मुसलमान अपना पैसा शादी ब्याह में या ओसर में या फालतू चीजें खरीदने में पैसा ज्यादा खर्च करते हैं। जहां पर पैसा खर्च करना चाहिए वहां पर पैसा खर्च नहीं करते हैं जिससे वह नुकसान उठाते हैं।

5. मुसलमान का ईमान मजबूत न होना।

हिंदुस्तान के मुसलमान की आबादी भारत में 20 से 25 फ़ीसदी है, लेकिन आबादी कितनी भी हो चाहे कम हो चाहे इससे ज्यादा हो यह कोई मायने नहीं रखता बल्कि मायने यह रखता है कि मुसलमान का ईमान कितना पक्का है। ईमान का मतलब यह है कि मुसलमान अपने अल्लाह और हजरत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु  अलैहि वसल्लम की बातों को मानता हो , मोहम्मद के तरीके पर चलता हो अल्लाह के जो अहकाम है उनको पूरा करता हो  और जो तरीका है, मोहम्मद ए मुस्तफा है उस पर चलता हो ,यकीनन उस शख्स का ईमान पक्का है । ईमान पर चलना और ईमान पर अमल करना यही सबसे बड़ी मजबूत दलील है ।आज हिंदुस्तान में मुसलमान 25 फ़ीसदी में से सिर्फ दो फीस दी मुसलमान नमाज पढ़ते हैं। 5 फीसदी जुमा की नमाज पढ़ते हैं और 15 फ़ीसदी ईद की नमाज में पढ़ते हैं अक्सर हमारे गांव की मस्जिद या शहर की मस्जिद है पांच वक्त की नमाज में खाली पड़ी रहती है तो बताओ उसे बस्ती में मुसलमान का क्या हाल होगा क्या मुसलमान तरक्की करेगा या विनाश की ओर जाएगा मुसलमान को तरक्की करने में कोई अगर चीज रोक रही है तो वह नमाज  है । अगर मुसलमान दीन का पक्का रहकर ईमान पर चलता है और अपने सारे काम करता है यकीनन वो  मुसलमान तरक्की याफ्ता है।   उसकी इज्जत दुनिया में भी है और आखीरत  में भी है।

मुसलमानो का हमदर्द कोन?

जी हां दोस्तों असली हमदर्द वही है जो किसी मजलूम का जुल्म के वक्त साथ दें उसको हिम्मत बंधाए या हौसला अफजाई करें । वह चाहे मुस्लिम हो चाहे गैर मुस्लिम हो चाहे कोई संस्था या पार्टी  हो चाहे वह मीडिया हो ,चाहे वह सरकार का नुमाइंदा हो, चाहे कोई और ऑफिसर हो अगर मजलूम के पक्ष में जालिम के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया के तहत जिस मजलूम का साथ दिया जाता है, वही लोग  मजलूम मुसलमानों के हमदर्द है । उस मुसलमान मजलूम का या तो उसका कोई रिश्तेदार या पड़ोसी या कोई उनका प्रतिनिधित्व राजनीतिक या कोई सरकारी कर्मचारी या अधिकारी यहां तक वह कानूनी प्रक्रिया में गुजरता है, जो उसका लीगल तरीके से साथ देते हैं कानून के मुताबिक अपना फैसला करते हैं वही लोग असली हमदर्द है।

आज हिंदुस्तान में के हर सूबे में हर  जगह-जगह मुसलमानों को मौत का निशाना बनाया जा रहा है। मोबलीचिंग की जा रही है। मुसलमानों के ऊपर तरह-तरह के जुल्म ढाए जा रहे हैं, या कहीं ऐसी जगह पर हिंदू मुसलमानों के दंगे भड़काए जा रहे हैं, या किसी अकेले मुसलमान को देखकर  उससे मारा पीटा जा रहा है और उसके साथ गंदी हरकतें की जा रही है ,जिससे मुसलमान जुल्म का शिकार हो रहा हैं।

इस  दुख की घड़ी में मजलूम का साथ देना बहुत ही जरूरी है ,चाहे उसका कानूनी प्रक्रिया में साथ होने की बात हो , या हौसला अफजाई हो किसी भी तरह से मजलूम का साथ देना बहुत ही नेक काम है । उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होना चाहिए ताकि हम लोग नेक दिल इंसान बन सके।अगर  सामने वाला जालिम के पक्ष में बोलता है तो वो भी  इंसान जालिम कहलाता है । हमें चाहिए मजलूम का साथ दें,वरना हमारी गिनती भी जालिमों में होगी और कल हम भी जुल्म का शिकार होंगे


हालांकि आज भी हमारे प्यारे मुल्क हिंदुस्तान में  काफी हद तक हिंदू मुसलमान में आपस में भाईचारा है। प्यार और मोहब्बत है, एक दूसरे के मामलात में दुख सुख में साथ रहते हैं उठते  बैठते हैं, खाते पीते हैं अच्छा व्यवहार कर




ते हैं और एक दूसरे के साथ व्यवसाय भी करते हैं लेकिन कुछ लोग हैं चंद मुट्ठी भर जो देश के माहौल को गंदा करते हैं । जिसे कुछ हद तक हिंदू मुसलमान के अंदाज नफरत पैदा हो रही है हमें इस बात से डरना नहीं चाहिए , हिम्मत और सब्र से काम लेना चाहिए अपने आप को जागरूक रखना चाहिए जिससे की हम मुकाबिल बन सके।

मुसलमानों के लिए नसीहत 

मुसलमान को चाहिए की हमें आज के युग में हर हाल में सक्रिय रहकर जिंदगी गुजारनी चाहिए। हमें इस जमाने में सबसे पहले अपने ईमान को मजबूत करना होगा ईमान का मतलब यह है, ईमान का मतलब यह है की हमें एक अल्लाह की इबादत और हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इताअत करनी होगी । अल्लाह के जो हुक्म है उनको मानना होगा उन पर  अमल करना  होगा, और मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के तरीके को अपनाना होगा। जिससे हमारा ईमान मजबूत हो , हमें हमें हमारे अपने पड़ोसी रिश्तेदार और अन्य भाइयों के साथ अच्छा मामलात रखना होगा, लेनदेन का व्यवहार सही होना चाहिए, ताकि हुकुकुल्लाह और हुकुकुल इबाद पर सच्चा और ईमानदार रहना होगा।अपनी औलाद को दीनी  तालीम और दुनियावी तालीम से जोड़ना होगा और हमें अपने व्यवसाय या व्यापार बड़ी तवज्जो के साथ मेहनत करनी होगी और हमें सोशल मीडिया पर जागरूक रहना होगा, सोशल मीडिया पर नजर रखनी होगी। आज के हालात को और आज के माहौल को देखना होगा परखना होगा। जिससे हम लोग मजलूम होने से बच सकें।


 लेखक -   मुराद खान जयसिंधर 








Motivetional speech of social workars

 *"जमाना तुम्हें जाहिल, अनपढ़ और भीख मांगता देखना चाहता है, हिंदुस्तान के मुस्तकबिल का हिस्सेदार नहीं बनाना चाहता, याद रखो अगर तुम आज न...