जी हाँ दोस्तों सलाम आदाब, जैसे ही कल 12वीं क्लास का कला वर्ग का परिणाम आया / ही थोड़ी सी खुशी भी हुई थोड़ी सी गमी भी हुई / इसका कारण यह है कि मैं बाड़मेर जिले की बात कर रहा हूं/ बाड़मेर जिले का जो दैनिक भास्कर बाड़मेर भास्कर समाचार पत्र है ,उसके मेन पृष्ठ पर 40 से ज्यादा लगभग बच्चों के फोटो थे, साथ में प्रतिशत भी लिखे हुए थे / उन प्रतिशत का( दायरा) आंकड़ा 90 से 100% के मध्य था /उसमें निराशा की बात यह थी मुस्लिम बालक का कोई फोटो नहीं था/ न कोई नाम न कोई इतने प्रतिशत तो इसका मैसेज मुस्लिम समाज में नकारात्मक जाता है, क्योंकि मुस्लिमों का जो छात्रों का जो प्रतिशत है वह 90 से कम है मुस्लिम समाज का अनुपात भी कम है यह सोचनीय प्रश्न है/
मुस्लिम छात्र आज के दौर में दो जगह पर शिक्षा हासिल करते हैं/ एक वह संस्थान जो राजकीय संस्थान है, यानी सरकारी संस्थान सरकारी कॉलेज हो सरकारी विद्यालय हो सरकारी विश्वविद्यालयों चाहे कोई भी हो राजकीय हो/ दूसरी वे संस्थान जो प्राइवेट हो या निजी हो जैसे निजी विद्यालय ,निजी कॉलेज, निजी आईटीआई संस्थान, निजी डिप्लोमा ,संस्थान आदि / इन संस्थानों में मुस्लिमों के बच्चे शिक्षा हासिल करते हैं इनमें सबसे ज्यादातर बच्चे सरकारी संस्थानों में शिक्षा हासिल करते हैं /सरकारी शिक्षण संस्थानों की बात करें तो सबसे ज्यादा सरकारी विद्यालय हैं/ और सरकारी विद्यालय में जो पढ़ाने वाले जो अध्यापक हैं ,उनमें सबसे ज्यादा हमारे मुस्लिम नौकर अध्यापक ही है /अफसोस की बात यह है इन विद्यालयों में अपने ही टीचर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हैं/ मैं सब की बात नहीं कर रहा हूं/ कुछ अध्यापक अच्छे भी है कुछ अध्यापक ईमानदार मेहनती भी है / शिक्षा की अहमियत को समझते भी है/ लेकिन अधिकतर अध्यापकों की मैं बात कर रहा हूं , अपने कर्तव्य के प्रति लापरवाही बरतते हैं हमारे लिए सबसे बड़ा अफसोसजनक/ विषय है/
कुछ बच्चे और बच्चियाँ निजी शिक्षण संस्थानों में
पढते हैं,अपने लाडलों की पढ़ाई करवाते हैं, उनके पास काफी रूपया पैसा है/ सही बात है जिनके पास रुपया और पैसा वही अपने बच्चों को अच्छी तरह से निजी शिक्षण संस्थानों में शिक्षा प्राप्त करवाएगा/ हर कोई आदमी इतना अमीर नहीं है, हर कोई आदमी इतना गरीब भी नहीं है ,फिर भी आज कल सरकारी स्कूलों में स्टाफ की सूची देखी जाए प्रत्येक विद्यालय में छोटे स्तर पर तो सबसे ज्यादा मुस्लिम अध्यापक ही होंगे /और वहां आबादी उस गांव की आबादी मुसलमानों की ही होगी/ लेकिन अफसोस की बात यह है उस स्कूल का रिजल्ट देखा जाए बड़ा चिंता का विषय हमारे सामने आ जाए /क्योंकि उस गांव के पटेल स्कूल के अध्यापक के बीच तालमेल बैठ जाता है लेनदेन का फिर पढ़ाई को कौन देखता है/ अध्यापक अपनी कागजी कार्रवाई करने में मस्त रहता है ,और उस गांव का पटेल उस अध्यापक से वसूली करने में व्यस्त रहता है फिर शिक्षा का क्या हाल होगा?
निजी विद्यालयों का परिणाम उन विद्यालय में पढ़ाने वाले जो अध्यापक होते हैं यह सरकारी अध्यापक नहीं होते हैं /सिर्फ और सिर्फ उनके पास डिग्री होती है और अनुभव होता है/ वह कम तनख्वाह में अधिक से अधिक बच्चों को मेहनत करवा कर अच्छी शिक्षा ग्रहण करवाते हैं /ताकि उन बच्चों का और बच्चियों का भविष्य सुधर जाए/ निजी विद्यालय के जितने भी अध्यापक होते हैं वह सब अच्छी मेहनत करवाते हैं /उनके सामने दो शर्तें होती है एक तो वह मजबूरी में पढ़ाना पड़ता है, उन्हें दूसरा उनके अपनी पैठ जमाने कै लिए पढ़ाते हैं ,तीसरे नंबर कम तनख्वाह में अच्छी मेहनत करवाते हैं, अगर वह नहीं अच्छी मेहनत करवाएंगे तो उन्हें बाहर का रास्ता भी दिखा दिया जाता है / इस वजह से निजी विद्यालयों में कड़े कानून और अनुशासन की पालना जरूरी होती है /तब जाकर उन बच्चों का और बच्चियों का अच्छा भविष्य तय होता है /और उनका परिणाम भी अच्छा आता है प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे और बच्चियां जिन का रिजल्ट आजकल देखा जाता है औसत 60 से 90 के बीच रहता है /और सरकारी विद्यालयों की बात करें परिणामों की तो उनका जो औसत परिणाम रहता है वह 40 से 70 के बीच रहता है तो दोनों की स्कूलों में दिन-रात का अंतर है /प्राइवेट स्कूलों में फैसिलिटी ज्यादा है /बाहरी नॉलेज आंतरिक नॉलेज भी दिया जाता है /सरकारी स्कूलों में सिर्फ और सिर्फ किताबी ज्ञान दिया जाता है /सरकारी स्कूलों के जो अध्यापक हैं उनकी तनख्वाह 60 हजार से ऊपर दी जाती है ,लेकिन निजी स्कूलों में टीचर होते हैं उनकी तनख्वाह 10 हजार से 20 हजार के बीच रहती है अधिकतम/ इतना दिन रात का अंतर होते हुए भी बच्चों के परिणाम में परिणामों में इतना अंतर क्यों ?यह बड़ा सोचनीय प्रश्न है इसके जिम्मेदार कोई सरकारी विद्यालय के अध्यापक और उनके अभिभावक है/ चाहे कोई भी अब विद्यालय हो उनके जिम्मेदार विद्यालय के स्टाफ और उस विद्यालय के गांव के लोग और उन बच्चों के अभिभावक ही जिम्मेदार हैं/ क्योंकि हमारे मुस्लिम समाज के अंदर अभी तक लंबी सोच नहीं चल पा रही है /जिसकी वजह से हमारा नाम और फोटो अखबार के उस मेन पृष्ठ पर आना चाहिए /वो नहीं आ रहा है ,जो कहीं ना कहीं बीच में बाधा बन रही है/
कुछ ऐसे गांव है जहां पर जाट या बिश्नोई समाज के लोग रहते हैं /उन सरकारी विद्यालयों में बच्चों का परिणाम निजी विद्यालयों से भी अच्छा रहता है, क्योंकि वहां के जो अध्यापक है उस गांव के लोगों के कहने पर चलते हैं उन लोगों के इशारों पर चलते हैं /उनका इशारा है शिक्षा की और है,इसलिए वे लोग जागरुक है उनका समाज जागरूक है और उन विद्यालयों की पढ़ाई शिक्षा प्राइवेट विद्यालय से भी बेहतर है/ यानी कि एक सरकारी विद्यालय होते हुए भी प्राइवेट विद्यालय से भी अच्छी पढ़ाई करवाते हैं /तब जाकर उनके रिजल्ट बच्चे प्रति बच्चे के परिणाम 90 से ऊपर रहते हैं/
मेरे कहने का मतलब यह है सरकारी विद्यालय में पढ़ाई अच्छी नहीं होती या गुणात्मक नहीं होती है/ तो इसका कारण यह है की जिस गांव में यह विद्यालय है वहाँ के लोग जागरुक नहीं है, चाहे कोई भी समाज में मुस्लिम समाज व मेघवाल समाज और चाय भी समाज और चाय राजपूत समाज हो मैं किसी की बात पर्सनल नहीं कर रहा हूं / लेकिन वहां के लोग जागरूक नहीं होंगे तो उस विद्यालय की पढ़ाई का स्तर नहीं सुधरेगा/ यह बात हकीकत है क्योंकि सरकार सिर्फ और सिर्फ कागजी कार्रवाई देखती है/ ना कि उनकी असली मूल्यांकन नहीं करती है / जिन गांव में सरकारी स्कूल है और जहां उन गांव में अध्यापक भी है और उस गांव के लोग विश्नोई हो जाए चौधरी समाज के हो तो वहां पढ़ाई अच्छी हो जाती है प्राइवेट विद्यालय से बेहतर है,तो इसका यही कारण है कि समाज के अंदर जागरूकता / तो सबसे पहले समाज के अंदर जागरूकता लाना है /उसे पहले अपने बच्चों को शिक्षित बनाना जरूरी है यह मैसेज आगे फॉरवर्ड करें/
धन्यवाद🙏💕
मुस्लिम छात्र आज के दौर में दो जगह पर शिक्षा हासिल करते हैं/ एक वह संस्थान जो राजकीय संस्थान है, यानी सरकारी संस्थान सरकारी कॉलेज हो सरकारी विद्यालय हो सरकारी विश्वविद्यालयों चाहे कोई भी हो राजकीय हो/ दूसरी वे संस्थान जो प्राइवेट हो या निजी हो जैसे निजी विद्यालय ,निजी कॉलेज, निजी आईटीआई संस्थान, निजी डिप्लोमा ,संस्थान आदि / इन संस्थानों में मुस्लिमों के बच्चे शिक्षा हासिल करते हैं इनमें सबसे ज्यादातर बच्चे सरकारी संस्थानों में शिक्षा हासिल करते हैं /सरकारी शिक्षण संस्थानों की बात करें तो सबसे ज्यादा सरकारी विद्यालय हैं/ और सरकारी विद्यालय में जो पढ़ाने वाले जो अध्यापक हैं ,उनमें सबसे ज्यादा हमारे मुस्लिम नौकर अध्यापक ही है /अफसोस की बात यह है इन विद्यालयों में अपने ही टीचर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हैं/ मैं सब की बात नहीं कर रहा हूं/ कुछ अध्यापक अच्छे भी है कुछ अध्यापक ईमानदार मेहनती भी है / शिक्षा की अहमियत को समझते भी है/ लेकिन अधिकतर अध्यापकों की मैं बात कर रहा हूं , अपने कर्तव्य के प्रति लापरवाही बरतते हैं हमारे लिए सबसे बड़ा अफसोसजनक/ विषय है/
कुछ बच्चे और बच्चियाँ निजी शिक्षण संस्थानों में
पढते हैं,अपने लाडलों की पढ़ाई करवाते हैं, उनके पास काफी रूपया पैसा है/ सही बात है जिनके पास रुपया और पैसा वही अपने बच्चों को अच्छी तरह से निजी शिक्षण संस्थानों में शिक्षा प्राप्त करवाएगा/ हर कोई आदमी इतना अमीर नहीं है, हर कोई आदमी इतना गरीब भी नहीं है ,फिर भी आज कल सरकारी स्कूलों में स्टाफ की सूची देखी जाए प्रत्येक विद्यालय में छोटे स्तर पर तो सबसे ज्यादा मुस्लिम अध्यापक ही होंगे /और वहां आबादी उस गांव की आबादी मुसलमानों की ही होगी/ लेकिन अफसोस की बात यह है उस स्कूल का रिजल्ट देखा जाए बड़ा चिंता का विषय हमारे सामने आ जाए /क्योंकि उस गांव के पटेल स्कूल के अध्यापक के बीच तालमेल बैठ जाता है लेनदेन का फिर पढ़ाई को कौन देखता है/ अध्यापक अपनी कागजी कार्रवाई करने में मस्त रहता है ,और उस गांव का पटेल उस अध्यापक से वसूली करने में व्यस्त रहता है फिर शिक्षा का क्या हाल होगा?
निजी विद्यालयों का परिणाम उन विद्यालय में पढ़ाने वाले जो अध्यापक होते हैं यह सरकारी अध्यापक नहीं होते हैं /सिर्फ और सिर्फ उनके पास डिग्री होती है और अनुभव होता है/ वह कम तनख्वाह में अधिक से अधिक बच्चों को मेहनत करवा कर अच्छी शिक्षा ग्रहण करवाते हैं /ताकि उन बच्चों का और बच्चियों का भविष्य सुधर जाए/ निजी विद्यालय के जितने भी अध्यापक होते हैं वह सब अच्छी मेहनत करवाते हैं /उनके सामने दो शर्तें होती है एक तो वह मजबूरी में पढ़ाना पड़ता है, उन्हें दूसरा उनके अपनी पैठ जमाने कै लिए पढ़ाते हैं ,तीसरे नंबर कम तनख्वाह में अच्छी मेहनत करवाते हैं, अगर वह नहीं अच्छी मेहनत करवाएंगे तो उन्हें बाहर का रास्ता भी दिखा दिया जाता है / इस वजह से निजी विद्यालयों में कड़े कानून और अनुशासन की पालना जरूरी होती है /तब जाकर उन बच्चों का और बच्चियों का अच्छा भविष्य तय होता है /और उनका परिणाम भी अच्छा आता है प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे और बच्चियां जिन का रिजल्ट आजकल देखा जाता है औसत 60 से 90 के बीच रहता है /और सरकारी विद्यालयों की बात करें परिणामों की तो उनका जो औसत परिणाम रहता है वह 40 से 70 के बीच रहता है तो दोनों की स्कूलों में दिन-रात का अंतर है /प्राइवेट स्कूलों में फैसिलिटी ज्यादा है /बाहरी नॉलेज आंतरिक नॉलेज भी दिया जाता है /सरकारी स्कूलों में सिर्फ और सिर्फ किताबी ज्ञान दिया जाता है /सरकारी स्कूलों के जो अध्यापक हैं उनकी तनख्वाह 60 हजार से ऊपर दी जाती है ,लेकिन निजी स्कूलों में टीचर होते हैं उनकी तनख्वाह 10 हजार से 20 हजार के बीच रहती है अधिकतम/ इतना दिन रात का अंतर होते हुए भी बच्चों के परिणाम में परिणामों में इतना अंतर क्यों ?यह बड़ा सोचनीय प्रश्न है इसके जिम्मेदार कोई सरकारी विद्यालय के अध्यापक और उनके अभिभावक है/ चाहे कोई भी अब विद्यालय हो उनके जिम्मेदार विद्यालय के स्टाफ और उस विद्यालय के गांव के लोग और उन बच्चों के अभिभावक ही जिम्मेदार हैं/ क्योंकि हमारे मुस्लिम समाज के अंदर अभी तक लंबी सोच नहीं चल पा रही है /जिसकी वजह से हमारा नाम और फोटो अखबार के उस मेन पृष्ठ पर आना चाहिए /वो नहीं आ रहा है ,जो कहीं ना कहीं बीच में बाधा बन रही है/
कुछ ऐसे गांव है जहां पर जाट या बिश्नोई समाज के लोग रहते हैं /उन सरकारी विद्यालयों में बच्चों का परिणाम निजी विद्यालयों से भी अच्छा रहता है, क्योंकि वहां के जो अध्यापक है उस गांव के लोगों के कहने पर चलते हैं उन लोगों के इशारों पर चलते हैं /उनका इशारा है शिक्षा की और है,इसलिए वे लोग जागरुक है उनका समाज जागरूक है और उन विद्यालयों की पढ़ाई शिक्षा प्राइवेट विद्यालय से भी बेहतर है/ यानी कि एक सरकारी विद्यालय होते हुए भी प्राइवेट विद्यालय से भी अच्छी पढ़ाई करवाते हैं /तब जाकर उनके रिजल्ट बच्चे प्रति बच्चे के परिणाम 90 से ऊपर रहते हैं/
मेरे कहने का मतलब यह है सरकारी विद्यालय में पढ़ाई अच्छी नहीं होती या गुणात्मक नहीं होती है/ तो इसका कारण यह है की जिस गांव में यह विद्यालय है वहाँ के लोग जागरुक नहीं है, चाहे कोई भी समाज में मुस्लिम समाज व मेघवाल समाज और चाय भी समाज और चाय राजपूत समाज हो मैं किसी की बात पर्सनल नहीं कर रहा हूं / लेकिन वहां के लोग जागरूक नहीं होंगे तो उस विद्यालय की पढ़ाई का स्तर नहीं सुधरेगा/ यह बात हकीकत है क्योंकि सरकार सिर्फ और सिर्फ कागजी कार्रवाई देखती है/ ना कि उनकी असली मूल्यांकन नहीं करती है / जिन गांव में सरकारी स्कूल है और जहां उन गांव में अध्यापक भी है और उस गांव के लोग विश्नोई हो जाए चौधरी समाज के हो तो वहां पढ़ाई अच्छी हो जाती है प्राइवेट विद्यालय से बेहतर है,तो इसका यही कारण है कि समाज के अंदर जागरूकता / तो सबसे पहले समाज के अंदर जागरूकता लाना है /उसे पहले अपने बच्चों को शिक्षित बनाना जरूरी है यह मैसेज आगे फॉरवर्ड करें/
धन्यवाद🙏💕