*"जमाना तुम्हें जाहिल, अनपढ़ और भीख मांगता देखना चाहता है, हिंदुस्तान के मुस्तकबिल का हिस्सेदार नहीं बनाना चाहता, याद रखो अगर तुम आज नहीं जागे तो कल तुम्हारी नस्लें तालीम और तरक्की की भीख मांगती फिरेंगी, सात समंदर पार से कोई तुम्हारा हाथ पकड़ कर कलम देने नहीं आएगा"*
_कलम की ताकत से तख्त बदल जाते हैं, जो कौमें सो जाती हैं वो वक्त से रुल जाती हैं। अपना मुस्तकबिल खुद बनाना पड़ता है, दुआ के साथ मेहनत के दरवाजे भी खटखटाने पड़ते हैं।_
ये लफ्ज़ नफरत के लिए नहीं, बेदारी के लिए हैं। मेरा मकसद किसी का दिल दुखाना नहीं है। मेरा मकसद आईना दिखाना है। बात सीधी है, सख्त है, लेकिन अपने ही लोगों के भले के लिए है। अगर आज हम अपनी कमजोरियों को नहीं मानेंगे तो कल हमारी आने वाली नस्लें हमें माफ नहीं करेंगी।
जमाना तुम्हें जाहिल देखना चाहता है, जमाना तुम्हें अनपढ़ देखना चाहता है, जमाना तुम्हें गली के नुक्कड़ पर बहस करता, शिकायत करता, और मायूस देखना चाहता है। जमाना तुम्हें हिंदुस्तान के मुस्तकबिल का हिस्सेदार नहीं बनाना चाहता। जमाना चाहता है कि तुम तालीम से दूर रहो, तिजारत से दूर रहो, सियासत से दूर रहो, अफसरी से दूर रहो, और सिर्फ भीड़ बनकर तालियां बजाते रहो।
लेकिन सवाल ये है कि तुम कब तक सोते रहोगे? कब तक दूसरों के रहमो करम पर जिंदा रहोगे? कब तक ये कहोगे कि "हमारा कोई नहीं है"?
अगर तुम खुद अपने बारे में नहीं सोचोगे, अपने बच्चों के मुस्तकबिल के लिए आज मेहनत नहीं करोगे, तो याद रखो सात समंदर पार से कोई फरिश्ता उतर कर तुम्हारा हाथ पकड़ कर कलम देने नहीं आएगा। कोई तुम्हारे घर की दहलीज पर दस्तक देकर ये नहीं कहेगा कि "उठो, तुम्हारे बच्चे को डॉक्टर बनाते हैं"।
आज हर गली में यही बात है कि मुसलमान तालीम से पीछे है। मुसलमान के बच्चे स्कूल छोड़ रहे हैं। मुसलमान की बेटियां 8वीं के बाद घर बैठा दी जाती हैं। मुसलमान के नौजवान डिग्री लेकर भी नौकरी के लिए दर-दर भटक रहे हैं क्योंकि हुनर नहीं है, अंग्रेजी नहीं है, कंप्यूटर नहीं है।
और उधर दूसरी तरफ? वो अपने 3 साल के बच्चे को प्ले स्कूल भेज रहे हैं, 10वीं में कोचिंग दिला रहे हैं, और 18 की उम्र में अफसर बना रहे हैं।
क्या तुमने कभी सोचा कि ये फर्क क्यों है? फर्क सिर्फ इतना है कि वो जाग गए और तुम अब भी नींद में हो।
हम मस्जिद और मदरसों के लिए तो दिल खोल कर चंदा देते हैं, लेकिन मदरसे में कंप्यूटर लैब, साइंस लैब और इंग्लिश टीचर के लिए 100 रुपये देने में सोचते हैं। हम शादी में 10 लाख उड़ा देते हैं, डीजे, फोटोग्राफी और दिखावे में, लेकिन बच्चे की फीस और कोचिंग के लिए कहते हैं "पैसे नहीं हैं"। हम फेसबुक और व्हाट्सएप पर कौम की तकरीरें शेयर करते हैं, लेकिन अपने घर के बच्चे से एक बार भी नहीं पूछते "बेटा होमवर्क किया?" हमारा नौजवान मोबाइल पर रील देखने में 5 घंटे दे देता है, लेकिन एक घंटा किताब को नहीं दे पाता। हम आपस में एक दूसरे की टांग खींचते हैं, हसद करते हैं, चुगली करते हैं, गीबत करते हैं, और फिर कहते हैं कि दुनिया हमें आगे नहीं बढ़ने देती। हम दूसरों की तरक्की देखकर जलते हैं और खुद मेहनत करने से जी चुराते हैं। हम 4 लोगों की महफिल में बैठकर अपने ही भाइयों की बुराई का कच्चा चिट्ठा खोलते हैं और फिर इत्तेहाद की दुहाई देते हैं। हम नशे, जुए और गैंगबाजी में अपना मुस्तकबिल जला रहे हैं, और फिर सिस्टम कोसते हैं। हमारे यहां तलाक के मामले बढ़ रहे हैं, छोटे-छोटे झगड़ों में घर टूट रहे हैं, और बच्चे सड़क पर आ रहे हैं। हम दहेज के नाम पर बेटियों को बोझ समझते हैं, जबकि इस्लाम में बेटी रहमत है। हम सूद, रिश्वत और धोखे को अपना लेते हैं और फिर बरकत न होने का रोना रोते हैं। हम पंचायत और तंजीम में कुर्सी के लिए लड़ते हैं, कौम के मुद्दों के लिए नहीं। हम उलेमा की इज्जत मुंह पर करते हैं और पीठ पीछे बुराई करते हैं। हम अपने ताजिरों से उधार लेकर वापस नहीं करते, और फिर कहते हैं कि मुसलमान का एतबार नहीं है। हम वोट के वक्त बिक जाते हैं, और 5 साल तक सरकार कोसते हैं। हम कब्रों और मजारों पर चढ़ावा चढ़ाने में लाखों खर्च कर देते हैं, लेकिन जिंदा इंसान की तालीम के लिए जेब नहीं खोलते। हमारा नौजवान खेल के मैदान में नहीं, गली में आवारागर्दी करता है। हम कारोबार में ईमानदारी छोड़ कर 2 नंबरी रास्ते अपनाते हैं और फिर कहते हैं कि बरकत नहीं है। हम पड़ोसी से जलते हैं, रिश्तेदार से दुश्मनी रखते हैं, और कौम की एकता की बात करते हैं। हम लड़कियों की शादी 30 की उम्र तक लटका देते हैं और फिर कहते हैं कि रिश्ते नहीं मिल रहे। हम सरकारी स्कीम और स्कॉलरशिप की जानकारी नहीं लेते और फिर कहते हैं कि हमारे लिए कुछ नहीं है। हम अपने बच्चों को दीन तो सिखाते हैं लेकिन दुनिया की दौड़ में पीछे छोड़ देते हैं।
इसलिए आज कौम पीछे है। इसलिए आज हमें पीछे समझा जाता है। इसलिए आज हमें हर जगह लाइन में सबसे पीछे खड़ा किया जाता है।
अब और नहीं। अब वक्त आ गया है कि हम अपनी सोच बदलें। हर घर से एक आलिम और एक अफसर निकालो, सिर्फ दीन नहीं, दुनिया की तालीम भी जरूरी है, स्कूल-कॉलेज भी, दीन और दुनिया दोनों साथ लेकर चलो। बेटियों को पढ़ाओ, जो कौम अपनी आधी आबादी को जंजीरों में जकड़ देती है वो कभी तरक्की नहीं कर सकती, बेटी पढ़ेगी तो दो घर रोशन होंगे। शादी में फिजूलखर्ची बंद करो, दिखावे में बरबाद करने के बजाए उस पैसे से बच्चे कोचिंग दिलाओ, हुनर सिखाओ, बिजनेस कराओ, सादगी अपनाओ। नशे, जुए और गैंगबाजी से नौजवानों को बचाओ, जेल और कब्रिस्तान कौम का मुस्तकबिल नहीं हो सकते, नौजवानों को स्किल, खेल और कारोबार की तरफ मोड़ो। एकता बनाओ, एक दूसरे की टांग खींचना बंद करो, हसद, चुगली और गीबत छोड़ो, जो पढ़ रहा है उसकी मदद करो, जो आगे बढ़ रहा है उसका हाथ थामो, तंजीम बनाओ। मस्जिद-मदरसों के साथ स्कूल भी, चंदा सिर्फ इमारत के लिए नहीं, तालीम के लिए भी दो, अपने बच्चों को कुरान के साथ कंप्यूटर और अंग्रेजी भी पढ़ाओ। सच्चाई और ईमानदारी अपनाओ, सूद, रिश्वत और धोखा छोड़ो, तिजारत में एतबार पैदा करो ताकि लोग कहें "मुसलमान का लफ्ज़ पत्थर की लकीर है"। घरों को बचाओ, छोटे झगड़ों को बड़ा मत बनाओ, तलाक आखिरी हल है, पहला नहीं, बच्चों की खातिर सब्र करो। सरकारी स्कीम, स्कॉलरशिप और नौकरियों की जानकारी लो, अपने हक के लिए आवाज उठाओ, लेकिन तालीम और हुनर के साथ। कारोबार में हलाल कमाई करो, उधार समय पर लौटाओ, एतबार बनाओ।
याद रखो, हुकूमतें और सिस्टम किसी को कुछ नहीं देते। जो मेहनत कर के हासिल करता है वही आगे बढ़ता है। और आगे बढ़ने के लिए ताकत चाहिए, और ताकत आती है तालीम, तिजारत और तंजीम से।
आज नहीं जागे तो कल तुम्हारी नस्लें किताबों में तुम्हारी मिसाल देकर पूछेंगी "हमारे बुजुर्गों ने हमारे लिए क्या किया था?" और जवाब में सन्नाटा होगा।
इसलिए उठो। कलम उठाओ। किताब खोलो। बच्चों को स्कूल भेजो। खुद को इस काबिल बनाओ कि दुनिया तुम्हें अनदेखा न कर सके।
क्योंकि मुस्तकबिल भीख में नहीं मिलता, मुस्तकबिल मेहनत से हासिल किया जाता है