- कुंई या बेरी:- जी हाँ दोस्तों👭👬👫 आज में आप के सामने एक नया अध्याय लेकर हाज़िर हुआ वो है कुईं।
- यह एक पेयजल का महत्वपूर्ण स्रोत है।
स्थानीय भाषा में कुईं को बेरी कहते हैं ये बेरियां पश्चिमी राजस्थान के जिलों में पायी जाती है। इसका महत्व आज भी बरकरार है, लेकिन इससे पहले अत्यधिक बेरियों का महत्व था, आज पेयजल सुविधाओं में बदलाव देखने को मिलता है, जिससे बेरियों के महत्व में कुछ कमी आ गयी। आज से सैकड़ों वर्ष पूर्व लोग पानी के लिए बेरियों पर ही निर्भर थे, क्योंकि उस समय पेयजल सुविधाओं का अभाव था इसलिए लोग पानी के लिए बेरियों पर ज़्यादा तवज्जो देते थे।
आज उतना तवज्जो नहीं देते हैं क्योंकि इस के पीछे दो अहम कारण है-
1.पाना का स्तर कम हो जाना, क्योंकि बरसात का पानी (पालर पानी) ही बेरियों के तल में जमा हो जाता है जिसे लोग पानी को चड़स के द्वारा बाहर निकालते हैं। आज पश्चिम राजस्थान में वर्षा की भयंकर😱 कमी की वजह से पानी💧 का जलस्तर नीचे चला गया है, इससे लोगों का मोह बेरियों से हट गया है।
2.पेयजल सुविधाओं में विस्तार, आज जमीन का पानी निकलने के लिए बड़ी बड़ी मशीनों से पाताल का पानी निकाला जाता है, उसके अलावा नहरों के पानी को उपलब्ध करवाना।
बेरी का आकार:- बेरी की गहराई 10-15 मीटर तक होती है ,बेरी अन्दर से चोड़ाई 2-3फीट तक होती है। इस के अन्दर जो पाणी मिलता है उसे पालर पानी कहते हैं, बेरी कि खुदाई करने वाले को चेजारा कहते हैं। पश्चिम राजस्थान में पेयजल का महत्वपूर्ण स्रोत आज भी बेरियां है ,लेकिन कुछ बेरियों में आज भी पानी अथाह भरा पड़ा है, ज्यादातर बेरियां पानी💧 से सूख चुकी है और यहाँ तक रेत ⌛ से दब चुकी है।
धन्यवाद🙏💕।
।। जय हिंद जय भारत।।

Nice, thanks
जवाब देंहटाएंशुक्रिया
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