Samajik karykartaa kese bne

 

Samajik Karyakarta Kaise Bane


Samajik karyakarta banne ke liye, kuch mukhya kadam hain:


1.Udyamita aur Samriddhi: Samajik karyakarta banne ke liye, aapko udyamita aur samriddhi ka vikas karna hoga. Apne maksad aur uddeshya ko samajik sudhar par kendrit karein.


2.Shikshan aur Gyan: Samajik muddon ko samajhne ke liye, shikshan aur gyan ka mahatva hai. Vidya prapt karein aur samajik vishayon mein apni knowledge ko badhayein.


3.Sankalan aur Sajagta: Samajik samasyaon ko pahchanne aur samriddhikaran ke liye sankalan aur sajagta jaruri hai. Samaj mein hone wale badlavon ko dhyan se dekhein.


4.Seva Bhav: Samajik karyakarta banne ke liye seva bhav ka hona zaroori hai. Khud ko samajik seva mein samarpit karein.


5.Sathiyon ka Sangathan: Ek saath mil kar samajik muddon ko suljhane mein asar hota hai. Sathiyon ka sangathan karein aur mil kar kaam karein.


6.Prashikshan aur Anubhav: Samajik karyakarta banne ke liye, prashikshan aur anubhav prapt karna mahatvapurn hai. Karyakramon aur abhiyanon mein bhagidari karein.


7.Samay Ka Mahatva: Samajik karyakarta banne ke liye, samay ka sahi istemal karna avashyak hai. Samajik karyo mein samay bitayein aur usko uchit tarike se prabandhit karein.


8.Dhyan rakhein ki samajik karyakarta banne ke liye nishpaksh aur sashakti se bhara vyakti banne ka prayas karein. Samajik karyakarta banne ke liye nirdharit prakriya ya prashikshan pradan karne wale sangathanon ka saath lein.





Aimim party

AIMIM पार्टी का परिचय -आल इंडिया मजलिस इत्तिहादुल मुसलिमीन के नाम इस पार्टी की स्थापना पुराने शहर हैदराबाद मैं कायम हुई थी ।भारत की सबसे प्राचीन पार्टी के रुप मैं पहचानी जाती है।एम आई एम पार्टी का संस्थापक अब्दुल वाहेद ओवेसी और उनके पुत्र सलाहुद्दीन औवेसी उनके पुत्र असद्दुदीन औवेसी है जो पांचवीं बार हैदराबाद से सांसद बने हैं और वर्तमान पार्टी कै बतोर अध्यक्ष भी हैं।

एम आई एम पार्टी का विस्तार -एम आई एम पार्टी भारत के मशहूर शहर हैदराबाद से निकल कर भारत के दूसरे शहरों और राज्यों में अपना पैर पसार रही है, इसका मतलब है कि पार्टी अपना आए दिन विस्तार कर रही हैं और लोगों के दिलों पर राज़ भी कर रही है ।एम आई एम पार्टी के दो सांसद सदस्य हैं, तेलंगाना राज्य मैं सात विधायक है और बिहार में पांच विधायक हैं, और महाराष्ट्र में दो विधायक है ,एक महाराष्ट्र से सांसद सदस्य हैं। वर्तमान उत्तर प्रदेश मेंं चुनाव दम खम के साथ मैदान मैं उतर चुकी है, उनका क्या इतिहास बनता है ये अब वक्त  ही बताएगा । 


एम आई एम पार्टी के विस्तार का क्या मतलब है? 

हिन्दुस्तान की एकमात्र शायद ही एसी पार्टी है जो हर किसी वर्ग, जाती ,धर्म के बिना भेदभाव के हर मज़लूम इन्सान के साथ खड़ी है । विशेष अल्पसंख्यक और दलितों के साथ हर दम उनकी आवाज को उठाती हुई नज़र आ रही है ।क्योंकि संविधान ने जो उनको अधिकार दिये हैं, उनका अपना हक पूरा नहीं मिल रहा है जिनकी वजह से असद्दुदीन औवेसी हर वर्ग की पुरजोर तरीक़े से पार्लियामेंट हो या रैली मैं हो ,हर तरह  से सब के हक की आवाज़ उठा रहे है ।भारत के एकमात्र सांसद औवेसी हैं जिनहें संसद रत्न पुरस्कार से 
नवाजा गया है और सो प्रतिशत जनता की और देश के विकास के लिए आवाज उठाते हैं।

एम आई एम की लीडरशिप क्यों ?

एम आई एम पार्टी एक मात्र ऐसी पार्टी है जो सब के हित की आवाज उठाती है, संविधान के दायरे में रहकर अपने हकुक की मांग करती है।एम आई एम पार्टी में जो भी उम्मीदवार और नेता हैं सब बड़े विद्वान और जागरूक प्रतिनिधित्व करनेवाले हैं।एम आई एम पार्टी के हर कार्यकर्ता के अन्दर लीडरशिप की भावना मौजूद हैं।जिसके कारण आम जनता की आवाज सरकार के कानों तक जरूर गूंजती हुई सुनाई देती हैं।

एम.आई.एम एम.आई.एम पार्टी पर इल्ज़ाम क्यों पार्टी पर इल्ज़ाम क्यों?

जब से एम आई एम पार्टी अपने शहर हैदराबाद से बाहर अन्य शहरों मैं हक की आवाज को उठाती है और अपने उम्मीदवार को चुनाव मैदान मैं उतारकर सियासत में अपना लेना चाहती है, तब विपक्षी पार्टियां इस पर बहुत सारे इल्ज़ाम लगाती है, ये मजलिस भाजपा की बी टीम है, ये जिन्ना की पार्टी है, फलां फलां, एसे आरोप लगते रहे, मगर ये सब आरोप निराधार है।एम आई एम पार्टी देश के हर मध्यम वर्ग, अल्पसंख्यक, और दलित वर्ग के साथ हरदम खड़ी नजर आती है ,दबे कुचले लोगों की आवाज को उठाती है।विपक्षी पार्टियां इल्जाम इसलिए लगाती है कि उनका पीढी दर पीढी का वोट कट कर मजलिस के साथ जा रहा है।इसलिए उनके सीने में दर्द होता है।

मुसलमानों और दलित समाज की असल पार्टी कौन ?
जिस कांग्रेस पार्टी को मुसलमान और दलित समाज, और ओबी।सी वर्ग दशको से वोट देता आ रहा है मगर क्या उनकी आवाज को हकीकत में सुनी जा रही हैं या अभी भी कमी रह गई है।1947 से लेकर 2014 तक मुसलमानों औल दलित समाज का विकास कितना हुआ,विकास का मतलब ,आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, और शैक्षणिक ,स्वास्थ्य सेवा संम्बन्धित सभी पहलुओं से देखा जाऐ तो आज भी विकास के हर पैमाने पर सरकार फैल नज़र आ रही है।मुसलमानों और दलित समाज के लोगों ने आज त बीजेपी और कांग्रेस को वोट देती आई मगर इनको क्या मिला, दो बूंद के सिवा कुछ नहीं।आपकी आवाज के ऊपर कोई पार्टी ध्यान देती है तो वो एम.आई.एम पार्टी है।

असदुद्दीन ओवैसी एक दमदार लीडर और मुस्लिम कौम का हक़ीक़ी रहनुमा है।हर क्षेत्र मे शिक्षा, खेलकूद, समाज, राजनीति धर्म एवं आर्थिक मामलों में हर क्षेत्र में सबसे आगे, जिसमें कोई शक नहीं। उनको सच,हक और 
ईमानदरी के मसले पर बोलने से कोई रोक नहीं सकता है, संविधान के दायरे में रहकर ही बात करते हैं।भारत के अन्दर जितने भी नेता है उनमें 50 प्रतिशत राजनेताओं के ऊपर बड़े -बड़े मुकदमे दर्ज हैं,जबकि औवेसी एकमात्र ऐसे लीडर हैं जिनके ऊपर कोई मुकदमा है नहीं।
औवेसी की पार्टी के और भी सदस्य हैं जो बोलने मैं कभी हिचकिचाते नहीं है।


धन्यवाद !आपका दोस्त लेखक मुराद खान ।

हिंदुस्तान की खूबसूरती

दोस्तों सलाम ,आदाब आज बात हिन्दुस्तान की खूबसूरती को लेकर की जा रही है।हिन्दुस्तान दुनिया का वाहिद मुल्क है जो सभी धर्मों को एक साथ लेकर चलता है ।इस देश के अंदर सभी धर्म हिन्दू, मुस्लिम, सिख ईसाई, जैन,बोध और पारसी आदी मज़हब इस देश मैं सभी मिलजुल कर रहते हैं ये हमारे लिए बड़े फख्र की  बात है।हिन्दुस्तान दुनिया में आबादी के हिसाब से विश्व का दूसरा बड़ा देश है जो चसकी अपनी विशिष्ट पहचान है ।एक तरफ हिमालय पर्वत है, वही मध्य में उपजाऊ मैदान है जहाँ नदियां कल कल करती बहती है और उतर-पश्चिम मैं थार का रेगिस्तान मरुस्थल भुमि है ,हिन्दुस्तान के उत्तर मैं पठारी भाग है ।भारत की तीनों सीमाएं समुद्र से घिरी हुई है।


भारत की एक राष्ट्र भाषा  एवं राजभाषा, भारत का राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्र गान भारत एक लोकतांत्रिक संविधान   सबको एक धागे मैं पिरोने का कार्य करता है।भारत जेसे विशाल देश के अंदर सभी धर्म के लोग एक साथ हंसी और खुशी के साथ रहते हैं। भारत के अन्दर बहुलता हिन्दू धर्म की है, उसके बाद मुसलमानों की आबादी 15 प्रतिशत ।कुछ जगह आज भी असामाजिक तत्वों द्वारा अपनी राजनीतिक और स्वार्थ के लिए जरूर माहौल को दुषित करते हैं, लेकिन उसके बावजूद सभी लोग अपने अपने स्तर पर एक दूसरे के खुशी और गमी मे शरीक होते हैं ।आज भी लोगों के जाती पाती व धर्म को छोड़ सब के अंदर इन्सानियत के भाव आज भी ज़िन्दा है।








मुसलमानों का मोजूदा हाल

 दोस्तों सलाम ,आदाब आज बात हिन्दुस्तान के मुसलमानों की हो रही है, मुसलमान किस दिशा की तरफ जा रहा है।आज राजनीति का क्षेत्र हो या शैक्षिक क्षेत्र हो या आर्थीक क्षेत्र हो या सामाजिक क्षेत्र हो हर जगह से मुसलमान हाशिये पर नज़र आ रहा है, इसका मकसद क्या है दोस्तों?

इसका मकसद ये है कि हर एक को राजनीतिक पार्टियां मुसलमानों को वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल तो कर रही है मगर उनका हकीकत मैं जो विकास होना चाहिए वो नहीं हो रहा है सिर्फ उन्हें लोलीपॉप देकर शान्त करवाया जा रहा ।मुस्लिम प्रतिनिधि जो मुस्लिम समाज का प्रतिनिधित्व करने की क्षमता का दावा तो करते हैं मगर उन्हीं के आकाओं के सामने खुल कर बात करने की पूरी तरह पैरवी नहीं कर पाते हैं।वैसे भी मुस्लिम प्रतिनिधि अपने सामर्थ्य, स्वार्थ और सिद्ध के लिए अपने आकाओं की बातो को मानना पड़ता है, उन्हें पता है कि हम हमारी कौम के लिए हक और इन्साफ के लिए लड़ेंगे तो हमारी कोई अहमियत ही नहीं रहेगी।हिन्दुस्तान के अधिकतर मुसलमानों का जुड़ाव सत्तर दशक से कांग्रेस पार्टी से जुड़ाव रहा ,मग़र आज भी कांग्रेस मुसलमानों के हक की आवाज और उन्हें साथ लेकर चलने मैं हिचकिचा रही, कांग्रेस पार्टी अच्छी तरह जानती है कि उनका असली  हिन्दू वोट एक तरफा हो रहे हैं,इसलिए उन्हें हर जगह अपनी पार्टी का दायरा सीमित होता जा रहा है।

जब मुसलमानों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं होगा तब तब तक उनका असली विकास कत्तई नहीं होगा।आज हिन्दुस्तान मैं राजनीति का बड़ा खेल है, सभी  जातियों की आज राजनीति मैं लीडरशिप है । चाहे उस जाती या समुदाय की आबादी 2 प्ररतिशत ही क्यों न हो । मुसलमानों का  हमदर्द कोई भी नेता या न कोई भी पार्टी न बन सकी ,सिर्फ उन्हें दरी बिछाने, इफ्तार पार्टी और दरगाह पर चादर भेंट करने  और तालियां बजाने तक तक सीमित कर दिया ये असली सच्चाई है।

 

मुसलमानों को करना चाहिए?

हिन्दुस्तान के मुसलमान सत्तर साल से कांग्रेस और अन्य  सैकुलर पार्टियों को वोट देता आ रहा है मगर आज तक उनके हाथ कुछ नहीं लगा,क्या मुसलमानों के सामने विकल्प नहीं है?क्या अब भी मुसलमानों का कोई लीडरशिप नेता मोजूद नहीं है?क्या मुसलमान अब नींद मैं सो रहा है? क्या हिन्दुस्तान का मुसलमान अपने आपको अब भी पहचान नहीं पाए? 

इन सब सवालों के जवाब अगले लेख मैं मिलेंगे इन्शाअल्लाह!

धन्यवाद आपका दोस्त, साथी ,लेखक मुराद खान 

जयसिंधर ।




जय जवान जय किसान

दोस्तों सलाम व आदाब, जय जवान जय किसान ,सरकार का ये  हकीकी नारा था ,या मात्र जुबानी जुमला था।किसान जिसको अन्नदाता कहा जाता था।

मुस्लिमों का राजनीतिकरण

 दोस्तों सलाम व आदाब ।मुझे उम्मीद है कि आप हज़रात खैरो आफियत से होंगे।आज काफी दिनों बाद एक पोस्ट लिखने का मन कर रहा था।तब सोचा किस.तरह का विषय चुना जाए।एक दिमाग़ मैं विचार आया कि अभी राजस्थान के अंदर पंचायत समिति औंर जिला परिषद सदस्यों के चुनाव का माहौल गर्म जोशी के साथ चल रहा है ।हिन्दुस्तान के मुखतलिफ शूबो मैं चुनाव होते रहते है और चलते रहते है।तब एक टापिक समझ में आया कि ,"मुसलमानों का राजनीतिकरण"पर एक लेख लिखा जाए।


क्योंकि ये बात सत्य है कि जब किसी भी रियासत के अन्दर चुनाव आते हैं तब वहाँ पर हर पार्टी को मुसलमान तबका याद आता है।उससे पहले कुछ भी याद नहीं आता है।आज ये माहौल हिन्दुस्तान के अंदर चल रहा है।हर रियासत के अन्दर मुसलमानों की आबादी के मुताबिक उनकों अपना प्रतिनिधित्व नहीं मिलता है और जो पार्टी मुसलमानों को पाल पोष कर बड़ा तो कर देती है ,मगर उनका पूर्ण विकास नहीं कर सकती है।

आज हिन्दुस्तान के अंदर केंद्र और अधिकतर शूबों मैं भाजपा सरकार सत्ता मैं है जिनका वर्चस्व काफी बढता नजर आ रहा है।और उसके विपक्षी बड़ी पार्टी कांग्रेस जिनका वर्चस्व काफी घटता नजर आ रहा है।ऐसा  लग रहा है कि कांग्रेस सरकार हाशिये पर आ खड़ी हुई है।यह विशलेषण खुद कांग्रेस सरकार को करना है।बाकी अन्य सभी पार्टियां जिनका वजूद अधिकांशतः राज्यों तक ही सिमीत है।

चुनाव का वक्त आता है ,मुसलमान जरूर याद आता है।एक अहम पार्टी क़ो छोड़ कर,बाकी सभी पार्टियों को।जैसे ही चुनाव का वक्त आता है और मुसलमानों के वोट लेकर ,मुसलमानों को भूल जाते हैं।जब जरूरत पड़े तभी बुलाना है, जरूरत नहीं पड़े तब क्यों बुलावे।अपनी जरूरत इनके वोटों से थी, अब अपना काम बन गया, भाड़ मैं जाए जनता।।अब मुसलमानों का कार्य है कि जिनको आप ने सत्ता की कुर्सी पर बिठाया है उनके कान मैं आवाज डालो कि जनाब हम मुसलमान हैं हमारा काम करो। बस हां हा करते  रहेंगे।क्योंकि जब बच्चा रोएगा नहीं तो मां भी दूध नहीं पिलाऐगी । ये बात सत्य है।जबहम जागते हैं तब तक हमारा काम तमाम हो जाता है।


आज हिन्दुस्तान के अंदर कोई भी पार्टी कितनी ही बड़ी सैक्यूलर क्यों न हो ,बस दिखती कुछ ओर है करती कुछ ओर है।

एक कहावत है न हाथी के दांत खाने के कुछ ओर होते है ओर दिखाने के कुछ ओर होते हैं।।

सिवाय एक पार्टी को छोड़ कर बाकी सभी पार्टियां अल्पसंख्यक और दलितों के बल बूते  पर जीत कर ही संसद या विधानसभा मैं प्रतिनिधित्व जाते हैं।

मुसलमानों का राजनीतिकरण क्यों हो रहा है ?

मुसलमानों का उपयोग वोटबैंक के रूप मे क्यों हो रहा है?

हां!मुसलमानों का उपयोग वोट बैंक के रूप में होता है।हिन्दुस्तान मुल्क के अन्दर सिवाय एक पार्टी के अलावा बाकी सभी पार्टियां, जिनके ज्यादातर प्रतिनिधित्व मुसलमानों के बल बूते पर ही जीत के संसद या विधानसभा मैं जाते हैं।

लेकिन मुसलमानों के लिए क्या कार्य करते हैं?

मुसलमानों के विकास के लिए क्या रणनीतियाँ बनाते हैं?

क्या मुसलमानों के लिये आरक्षण की व्यवस्था है?

मुसलमानों के विकास के लिए क्या क्या कदम उठाए जारहे हैं।

सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिस्रा कमेटी मैं बतायी गई मुसलमानो की स्थिति को लेकर सरकारें कितनी गंभीर है।

इन सब प्रशनों का उत्तर ना ही मिलेगा।क्योंकि सभी सत्ता धारी पार्टियों को आपके विकास की जरूरत नहीं है, बल्कि वोटों की जरूरत है।यही सच्चाई हमारे मुल्क हिन्दुस्तान मैं मुसलमानों की है।

जो राजनैतिक प्रतिनिधित्व जीत के जब संसद या विधानसभा में जाता है लेकिन मुसलमानों के काम काज के बारे मैं काभी बात नहीं करेगा।संसद के अन्दर मुसलमानों के खिलाफ कैसे भी बिल लाए जाएं, आपके वोटों से जीतने वाला उम्मीदवार कभी आप का मसीहा  नहीं बनेगा।बड़ै अचरज की बात है, आपके वोटों से जीतने वाला उम्मीदवार ,आपकी आवाज़ कभी नहीं बनता।मगर आपका बनेगा तो वहीं जो आपका अपना होगा।

संसद के अन्दर इतनी संख्या में, सैकडों की संख्या में प्रतिनिधित्व बैठे हैं, फिर भी आपकी आवाज मात्र 1-2 प्रतिशत ही उठाते हैं लेकिन आपके ही वोटों से 60 प्रतिशत जीत के संसद मैं जाते हैं।एसा क्यों? 

भाईयों हमें सोचने और समझने की बात है।आज का वक्त बहुत नाजुक है, अपने प्रतिनिधित्व को सही तरीका से पहचान कर ,ही उसको वोट देंवे।आपकी भलाई और आपका विकास वही बन्दा करेगा जो अपना होगा।।

अपना नेतृत्व करना खुद सीखें, आपकी मुसीबत मैं कोई भी पार्टी सहायता नहीं करेगी, न कांग्रेस और न कोई दीगर पार्टियां ।अपना संघर्ष खुद करिए ,अपना संबल खुद बनिए।वरना लोग तो आप की जड़ें उखाडऩे के लिए तैयार हैंं।


अपन

                   💐💐धन्यवाद💐💐

                   जय हिन्द जय भारत 

मुराद खान जयसिंधर ,अध्यापक, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता।



12 वीं कला वर्ग का परिणाम (आशा और निराशा)

जी हाँ दोस्तों सलाम आदाब,   जैसे ही कल 12वीं क्लास का कला वर्ग का परिणाम आया / ही थोड़ी सी खुशी भी हुई थोड़ी सी गमी भी हुई / इसका कारण यह है कि मैं बाड़मेर जिले की बात कर रहा हूं/ बाड़मेर जिले का जो दैनिक भास्कर बाड़मेर भास्कर समाचार पत्र है ,उसके मेन पृष्ठ पर 40 से ज्यादा लगभग बच्चों के फोटो थे, साथ में प्रतिशत भी लिखे हुए थे / उन प्रतिशत का( दायरा) आंकड़ा 90 से 100% के मध्य था /उसमें निराशा की बात यह थी मुस्लिम बालक का कोई फोटो नहीं था/ न कोई नाम न कोई इतने प्रतिशत तो इसका मैसेज मुस्लिम समाज में नकारात्मक जाता है, क्योंकि मुस्लिमों का जो छात्रों का जो प्रतिशत है वह 90 से कम है मुस्लिम समाज का अनुपात भी कम है यह सोचनीय प्रश्न है/
मुस्लिम छात्र  आज के  दौर में दो जगह पर शिक्षा हासिल करते हैं/ एक वह संस्थान जो राजकीय संस्थान है, यानी सरकारी संस्थान सरकारी कॉलेज हो सरकारी विद्यालय हो सरकारी विश्वविद्यालयों चाहे कोई भी हो  राजकीय हो/ दूसरी वे संस्थान जो प्राइवेट हो या निजी हो जैसे  निजी विद्यालय ,निजी कॉलेज, निजी आईटीआई संस्थान, निजी डिप्लोमा ,संस्थान आदि / इन संस्थानों में मुस्लिमों के बच्चे शिक्षा हासिल करते हैं इनमें सबसे ज्यादातर बच्चे सरकारी संस्थानों में शिक्षा हासिल करते हैं /सरकारी शिक्षण संस्थानों की बात करें तो सबसे ज्यादा सरकारी विद्यालय हैं/ और सरकारी विद्यालय में जो पढ़ाने वाले जो अध्यापक हैं ,उनमें सबसे ज्यादा हमारे मुस्लिम नौकर अध्यापक ही है /अफसोस की बात यह है इन विद्यालयों में अपने ही टीचर अपने ही  पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हैं/ मैं सब की बात नहीं कर रहा हूं/ कुछ अध्यापक अच्छे भी है कुछ अध्यापक ईमानदार मेहनती भी है / शिक्षा की अहमियत को समझते भी है/ लेकिन अधिकतर अध्यापकों की मैं बात कर रहा हूं , अपने कर्तव्य के प्रति लापरवाही बरतते हैं हमारे लिए सबसे बड़ा अफसोसजनक/ विषय है/

कुछ बच्चे और बच्चियाँ निजी शिक्षण संस्थानों में
पढते हैं,अपने लाडलों  की पढ़ाई करवाते हैं, उनके पास काफी  रूपया पैसा है/  सही बात है जिनके पास रुपया और पैसा वही अपने बच्चों को अच्छी तरह  से निजी शिक्षण संस्थानों में शिक्षा प्राप्त करवाएगा/ हर कोई आदमी इतना अमीर नहीं है,  हर कोई आदमी इतना गरीब भी नहीं है ,फिर भी आज कल सरकारी स्कूलों में स्टाफ की सूची देखी जाए प्रत्येक विद्यालय में छोटे स्तर पर तो सबसे ज्यादा मुस्लिम अध्यापक ही होंगे /और वहां आबादी उस गांव की आबादी मुसलमानों की ही होगी/ लेकिन अफसोस की बात यह है उस स्कूल का रिजल्ट देखा जाए बड़ा चिंता का विषय हमारे सामने आ जाए /क्योंकि उस गांव के पटेल स्कूल के अध्यापक के बीच तालमेल बैठ जाता है लेनदेन का फिर पढ़ाई को कौन देखता है/ अध्यापक  अपनी कागजी कार्रवाई करने में मस्त रहता है ,और उस गांव का पटेल उस अध्यापक से वसूली करने में व्यस्त रहता है फिर शिक्षा का क्या हाल होगा?

 निजी विद्यालयों का परिणाम उन विद्यालय में पढ़ाने वाले जो अध्यापक होते हैं यह सरकारी अध्यापक नहीं होते हैं /सिर्फ और सिर्फ उनके पास डिग्री होती है और अनुभव होता है/ वह कम तनख्वाह में अधिक से अधिक बच्चों को मेहनत करवा कर अच्छी शिक्षा ग्रहण करवाते हैं /ताकि उन बच्चों का और बच्चियों का भविष्य सुधर जाए/ निजी विद्यालय के जितने भी अध्यापक होते हैं वह सब अच्छी मेहनत करवाते हैं /उनके सामने दो शर्तें होती है एक तो वह मजबूरी में पढ़ाना पड़ता है, उन्हें दूसरा उनके अपनी पैठ जमाने कै लिए पढ़ाते हैं ,तीसरे नंबर कम तनख्वाह में अच्छी मेहनत करवाते हैं, अगर वह नहीं अच्छी मेहनत करवाएंगे तो उन्हें बाहर का रास्ता भी दिखा दिया जाता है / इस वजह से निजी विद्यालयों में कड़े कानून और अनुशासन की पालना जरूरी होती है /तब जाकर उन बच्चों का और बच्चियों का अच्छा भविष्य तय होता है /और उनका परिणाम भी अच्छा आता है प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे और बच्चियां जिन का रिजल्ट आजकल देखा जाता है औसत 60 से 90 के बीच रहता है /और सरकारी विद्यालयों की बात करें परिणामों की तो उनका जो औसत परिणाम रहता है वह 40 से 70 के बीच रहता है तो दोनों की स्कूलों में दिन-रात का अंतर है /प्राइवेट स्कूलों में फैसिलिटी ज्यादा है /बाहरी नॉलेज आंतरिक नॉलेज भी दिया जाता है /सरकारी स्कूलों में सिर्फ और सिर्फ किताबी ज्ञान दिया जाता है /सरकारी स्कूलों के जो अध्यापक हैं उनकी तनख्वाह 60 हजार से ऊपर दी जाती है ,लेकिन निजी  स्कूलों में टीचर होते हैं उनकी तनख्वाह 10 हजार से 20 हजार  के बीच रहती है  अधिकतम/ इतना दिन रात का अंतर होते हुए भी बच्चों के परिणाम में परिणामों में इतना अंतर क्यों ?यह बड़ा सोचनीय प्रश्न है इसके जिम्मेदार कोई सरकारी विद्यालय के अध्यापक और उनके अभिभावक है/ चाहे कोई भी अब विद्यालय हो उनके जिम्मेदार विद्यालय के स्टाफ और उस विद्यालय के गांव के लोग और उन बच्चों के अभिभावक ही जिम्मेदार हैं/  क्योंकि हमारे मुस्लिम समाज के अंदर अभी तक लंबी सोच नहीं चल पा रही है /जिसकी वजह से हमारा नाम और फोटो अखबार के उस मेन पृष्ठ पर आना चाहिए /वो  नहीं आ रहा है ,जो कहीं ना कहीं बीच में बाधा बन रही है/

 कुछ ऐसे गांव है जहां पर जाट या बिश्नोई समाज के लोग रहते हैं /उन सरकारी विद्यालयों में बच्चों का परिणाम निजी विद्यालयों से भी अच्छा रहता है, क्योंकि वहां के जो अध्यापक है उस गांव के लोगों के कहने पर चलते हैं उन लोगों के इशारों पर चलते हैं /उनका इशारा है शिक्षा की और है,इसलिए वे लोग जागरुक है उनका समाज जागरूक है और उन विद्यालयों की पढ़ाई शिक्षा प्राइवेट विद्यालय से भी बेहतर है/  यानी कि एक सरकारी विद्यालय होते हुए भी प्राइवेट विद्यालय से भी अच्छी पढ़ाई करवाते हैं /तब जाकर उनके रिजल्ट बच्चे प्रति बच्चे के परिणाम 90 से ऊपर रहते हैं/

  मेरे कहने का मतलब यह है सरकारी विद्यालय में पढ़ाई अच्छी नहीं होती या गुणात्मक नहीं होती है/ तो इसका कारण यह है की जिस गांव में यह विद्यालय है वहाँ  के लोग जागरुक नहीं है, चाहे कोई भी समाज में मुस्लिम समाज व मेघवाल समाज और चाय भी समाज और चाय राजपूत समाज हो मैं किसी की बात पर्सनल नहीं कर रहा हूं / लेकिन वहां के लोग जागरूक नहीं होंगे तो उस विद्यालय की पढ़ाई का स्तर नहीं सुधरेगा/  यह बात हकीकत है क्योंकि सरकार सिर्फ और सिर्फ कागजी कार्रवाई देखती है/ ना कि उनकी असली मूल्यांकन नहीं करती है / जिन गांव में सरकारी स्कूल है और जहां उन गांव में अध्यापक भी है और उस गांव के लोग विश्नोई हो जाए चौधरी समाज के हो तो वहां पढ़ाई अच्छी हो जाती है प्राइवेट विद्यालय से बेहतर  है,तो इसका यही कारण है कि समाज के अंदर जागरूकता / तो सबसे पहले समाज के अंदर जागरूकता लाना है /उसे पहले अपने बच्चों को शिक्षित बनाना जरूरी है यह मैसेज आगे फॉरवर्ड करें/

धन्यवाद🙏💕 

मिट्टी का बर्तन

दोस्तों सलाम आदाब आज मैं आपको एक नए प्रयोग  की ओर ले जा रहा हूं क्योंकि आज उस पेशेवर जाति के पास ले जाता हूं जो मिट्टी के बर्तन बनाते हैं ।हर इंसान के दिमाग में यह प्रश्न उठता है कि ,मिट्टी के बर्तन जो बनाते हैं वह कुमार जाती है । लेकिन वह बर्तन को घड़े को उसका रूप कैसे देते हैं ,?उसको पकाते कैसे हैं? मिट्टी कहां से लाते हैं? चित्रकारी कैसे करते हैं य?दिमाग हर आदमी के दिमाग में उपस्थित होता है तो आइए मैं आपको यह सारी स्तिथि क्लियर करवा देता हूं।
कुम्हार के बर्तन बनाने की कार्य की कारीगरी विश्व प्रसिद्ध अपने आप में अद्भुत है। वाकई इस दुनिया में कुम्हार जितनी कोई मेहनत नहीं करता होगा ,क्योंकि जितने कुमार की मेहनत है उतना फल कुम्हार को नहीं मिल पाता है।
तो आइए मिट्टी के बर्तन कैसे बनाते हैं?
सबसे पहले कुमार मिट्टी लेने के लिए बहुत दूर जाता होगा वह मिट्टी हर जगह उपलब्ध नहीं होती है वह ऐसी जगह होती है जहां कोई पुराने जमाने में कोई तालाब हो या कोई टोबा हो तो वहां बहुत गहराई में मिट्टी मिलती है जो चिकनी मिट्टी होती है उस मिट्टी को ऊंट गाडा या गधे पर लादकर मिट्टी लाता है उसके बाद मिट्टी को कूटकर शंकर आटे की तरह गोदकर तैयार करता है फिर उस मिट्टी को जैसा रूप देना चाहे जैसा आकार देना चाहे तो वह दे सकता है क्योंकि जैसा बर्तन बनाना है उसे हिसाब से वह मिट्टी के पेड़े मिट्टी के ढेले बनाकर इकट्ठे करता है फिर बर्तन बनाने की मशीन होती है जिसको बोलते हैं उसको एक गोल आकृति होती है उसको लकड़ी से घुमाया जाता है फिर उसके ऊपर कोई सा भी बर्तन बनाना हो चाहे घड़ा हो या मटका हो कोई अन्य बर्तन हो आकार में बर्तन को रूप दे दिया जाता है
फिरौन बर्तनों को कुछ सूखने दिया जाता है फिर कुमार उन बर्तनों को अपने गोद में लेकर उनके अंदर एक गोल पत्थर होता है जिसको कुनेरा बोलते हैं ऊपर दूसरे हाथ में एक हाथ की आकृति की भरी होती है जो लकड़ी की बनी होती है उससे कूट-कूट कर बड़ा करते हैं इसी तरह पूरा दिन लग जाता है घुटने में फ्रेंड बर्तनों को बर्तनों में चित्रकारी की जाती है महिलाओं द्वारा किरण को पकाया जाता है

वतन का पैगाम

                       वतन का पैगाम
1
   हुब्बुल वतन है ईमान
   इसकी हिफाजत करना है ईमान

2
   वतन को मुसीबत से बचाना है ईमान
    वतन को अपनी जान समझना ईमान

3
   चाहे जंग हो या सामाजिक  मामला
   मगर राह ए वतन नेक काम है ईमान

4 कानून के मुताबिक  वतन कौ अव्वल रखना  ईमान
   आईन को अपने दिल में रखना है ईमान

5 वतन के रखवाली करने वालों को मुराद  करता है       सलाम
   कोरोना महामारी से लड़ने वाले चिकित्सकों को         मुराद करता है सलाम।।



  •           जय हिंद जय भारत

Motivetional speech of social workars

 *"जमाना तुम्हें जाहिल, अनपढ़ और भीख मांगता देखना चाहता है, हिंदुस्तान के मुस्तकबिल का हिस्सेदार नहीं बनाना चाहता, याद रखो अगर तुम आज न...