दोस्तों सलाम आदाब आज मैं आपको एक नए प्रयोग की ओर ले जा रहा हूं क्योंकि आज उस पेशेवर जाति के पास ले जाता हूं जो मिट्टी के बर्तन बनाते हैं ।हर इंसान के दिमाग में यह प्रश्न उठता है कि ,मिट्टी के बर्तन जो बनाते हैं वह कुमार जाती है । लेकिन वह बर्तन को घड़े को उसका रूप कैसे देते हैं ,?उसको पकाते कैसे हैं? मिट्टी कहां से लाते हैं? चित्रकारी कैसे करते हैं य?दिमाग हर आदमी के दिमाग में उपस्थित होता है तो आइए मैं आपको यह सारी स्तिथि क्लियर करवा देता हूं।
कुम्हार के बर्तन बनाने की कार्य की कारीगरी विश्व प्रसिद्ध अपने आप में अद्भुत है। वाकई इस दुनिया में कुम्हार जितनी कोई मेहनत नहीं करता होगा ,क्योंकि जितने कुमार की मेहनत है उतना फल कुम्हार को नहीं मिल पाता है।
तो आइए मिट्टी के बर्तन कैसे बनाते हैं?
सबसे पहले कुमार मिट्टी लेने के लिए बहुत दूर जाता होगा वह मिट्टी हर जगह उपलब्ध नहीं होती है वह ऐसी जगह होती है जहां कोई पुराने जमाने में कोई तालाब हो या कोई टोबा हो तो वहां बहुत गहराई में मिट्टी मिलती है जो चिकनी मिट्टी होती है उस मिट्टी को ऊंट गाडा या गधे पर लादकर मिट्टी लाता है उसके बाद मिट्टी को कूटकर शंकर आटे की तरह गोदकर तैयार करता है फिर उस मिट्टी को जैसा रूप देना चाहे जैसा आकार देना चाहे तो वह दे सकता है क्योंकि जैसा बर्तन बनाना है उसे हिसाब से वह मिट्टी के पेड़े मिट्टी के ढेले बनाकर इकट्ठे करता है फिर बर्तन बनाने की मशीन होती है जिसको बोलते हैं उसको एक गोल आकृति होती है उसको लकड़ी से घुमाया जाता है फिर उसके ऊपर कोई सा भी बर्तन बनाना हो चाहे घड़ा हो या मटका हो कोई अन्य बर्तन हो आकार में बर्तन को रूप दे दिया जाता है
फिरौन बर्तनों को कुछ सूखने दिया जाता है फिर कुमार उन बर्तनों को अपने गोद में लेकर उनके अंदर एक गोल पत्थर होता है जिसको कुनेरा बोलते हैं ऊपर दूसरे हाथ में एक हाथ की आकृति की भरी होती है जो लकड़ी की बनी होती है उससे कूट-कूट कर बड़ा करते हैं इसी तरह पूरा दिन लग जाता है घुटने में फ्रेंड बर्तनों को बर्तनों में चित्रकारी की जाती है महिलाओं द्वारा किरण को पकाया जाता है
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें