मुस्लिमों का राजनीतिकरण

 दोस्तों सलाम व आदाब ।मुझे उम्मीद है कि आप हज़रात खैरो आफियत से होंगे।आज काफी दिनों बाद एक पोस्ट लिखने का मन कर रहा था।तब सोचा किस.तरह का विषय चुना जाए।एक दिमाग़ मैं विचार आया कि अभी राजस्थान के अंदर पंचायत समिति औंर जिला परिषद सदस्यों के चुनाव का माहौल गर्म जोशी के साथ चल रहा है ।हिन्दुस्तान के मुखतलिफ शूबो मैं चुनाव होते रहते है और चलते रहते है।तब एक टापिक समझ में आया कि ,"मुसलमानों का राजनीतिकरण"पर एक लेख लिखा जाए।


क्योंकि ये बात सत्य है कि जब किसी भी रियासत के अन्दर चुनाव आते हैं तब वहाँ पर हर पार्टी को मुसलमान तबका याद आता है।उससे पहले कुछ भी याद नहीं आता है।आज ये माहौल हिन्दुस्तान के अंदर चल रहा है।हर रियासत के अन्दर मुसलमानों की आबादी के मुताबिक उनकों अपना प्रतिनिधित्व नहीं मिलता है और जो पार्टी मुसलमानों को पाल पोष कर बड़ा तो कर देती है ,मगर उनका पूर्ण विकास नहीं कर सकती है।

आज हिन्दुस्तान के अंदर केंद्र और अधिकतर शूबों मैं भाजपा सरकार सत्ता मैं है जिनका वर्चस्व काफी बढता नजर आ रहा है।और उसके विपक्षी बड़ी पार्टी कांग्रेस जिनका वर्चस्व काफी घटता नजर आ रहा है।ऐसा  लग रहा है कि कांग्रेस सरकार हाशिये पर आ खड़ी हुई है।यह विशलेषण खुद कांग्रेस सरकार को करना है।बाकी अन्य सभी पार्टियां जिनका वजूद अधिकांशतः राज्यों तक ही सिमीत है।

चुनाव का वक्त आता है ,मुसलमान जरूर याद आता है।एक अहम पार्टी क़ो छोड़ कर,बाकी सभी पार्टियों को।जैसे ही चुनाव का वक्त आता है और मुसलमानों के वोट लेकर ,मुसलमानों को भूल जाते हैं।जब जरूरत पड़े तभी बुलाना है, जरूरत नहीं पड़े तब क्यों बुलावे।अपनी जरूरत इनके वोटों से थी, अब अपना काम बन गया, भाड़ मैं जाए जनता।।अब मुसलमानों का कार्य है कि जिनको आप ने सत्ता की कुर्सी पर बिठाया है उनके कान मैं आवाज डालो कि जनाब हम मुसलमान हैं हमारा काम करो। बस हां हा करते  रहेंगे।क्योंकि जब बच्चा रोएगा नहीं तो मां भी दूध नहीं पिलाऐगी । ये बात सत्य है।जबहम जागते हैं तब तक हमारा काम तमाम हो जाता है।


आज हिन्दुस्तान के अंदर कोई भी पार्टी कितनी ही बड़ी सैक्यूलर क्यों न हो ,बस दिखती कुछ ओर है करती कुछ ओर है।

एक कहावत है न हाथी के दांत खाने के कुछ ओर होते है ओर दिखाने के कुछ ओर होते हैं।।

सिवाय एक पार्टी को छोड़ कर बाकी सभी पार्टियां अल्पसंख्यक और दलितों के बल बूते  पर जीत कर ही संसद या विधानसभा मैं प्रतिनिधित्व जाते हैं।

मुसलमानों का राजनीतिकरण क्यों हो रहा है ?

मुसलमानों का उपयोग वोटबैंक के रूप मे क्यों हो रहा है?

हां!मुसलमानों का उपयोग वोट बैंक के रूप में होता है।हिन्दुस्तान मुल्क के अन्दर सिवाय एक पार्टी के अलावा बाकी सभी पार्टियां, जिनके ज्यादातर प्रतिनिधित्व मुसलमानों के बल बूते पर ही जीत के संसद या विधानसभा मैं जाते हैं।

लेकिन मुसलमानों के लिए क्या कार्य करते हैं?

मुसलमानों के विकास के लिए क्या रणनीतियाँ बनाते हैं?

क्या मुसलमानों के लिये आरक्षण की व्यवस्था है?

मुसलमानों के विकास के लिए क्या क्या कदम उठाए जारहे हैं।

सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिस्रा कमेटी मैं बतायी गई मुसलमानो की स्थिति को लेकर सरकारें कितनी गंभीर है।

इन सब प्रशनों का उत्तर ना ही मिलेगा।क्योंकि सभी सत्ता धारी पार्टियों को आपके विकास की जरूरत नहीं है, बल्कि वोटों की जरूरत है।यही सच्चाई हमारे मुल्क हिन्दुस्तान मैं मुसलमानों की है।

जो राजनैतिक प्रतिनिधित्व जीत के जब संसद या विधानसभा में जाता है लेकिन मुसलमानों के काम काज के बारे मैं काभी बात नहीं करेगा।संसद के अन्दर मुसलमानों के खिलाफ कैसे भी बिल लाए जाएं, आपके वोटों से जीतने वाला उम्मीदवार कभी आप का मसीहा  नहीं बनेगा।बड़ै अचरज की बात है, आपके वोटों से जीतने वाला उम्मीदवार ,आपकी आवाज़ कभी नहीं बनता।मगर आपका बनेगा तो वहीं जो आपका अपना होगा।

संसद के अन्दर इतनी संख्या में, सैकडों की संख्या में प्रतिनिधित्व बैठे हैं, फिर भी आपकी आवाज मात्र 1-2 प्रतिशत ही उठाते हैं लेकिन आपके ही वोटों से 60 प्रतिशत जीत के संसद मैं जाते हैं।एसा क्यों? 

भाईयों हमें सोचने और समझने की बात है।आज का वक्त बहुत नाजुक है, अपने प्रतिनिधित्व को सही तरीका से पहचान कर ,ही उसको वोट देंवे।आपकी भलाई और आपका विकास वही बन्दा करेगा जो अपना होगा।।

अपना नेतृत्व करना खुद सीखें, आपकी मुसीबत मैं कोई भी पार्टी सहायता नहीं करेगी, न कांग्रेस और न कोई दीगर पार्टियां ।अपना संघर्ष खुद करिए ,अपना संबल खुद बनिए।वरना लोग तो आप की जड़ें उखाडऩे के लिए तैयार हैंं।


अपन

                   💐💐धन्यवाद💐💐

                   जय हिन्द जय भारत 

मुराद खान जयसिंधर ,अध्यापक, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता।



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