में social worker and educationist blogg par समाजिक सेवा ,राजनीति और शिक्षा से संबधित पोस्ट लिखता हुं,आप लोग मेरी पोस्ट को जरूर पढ़ें,और आप अपने सुझाव कॉमेंट बॉक्स में जरूर भेजे।मेरे लेख को पढ़ने के लिए आप का बहुत बहुत धन्यवाद ज्यादा से ज्यादा मेरे इस पेज या ब्लॉग को फ़ॉलो जरूर करें. शुक्रिया सभी पाठको का।
Ek aadrsh adhyapak ke gun
Zamiyat Youths Club
मानवसेवा अल्लाह की एक अज़ीम इबादत और उसकी रज़ा हासिल करने का बेहतरीन ज़रिया है : मौलाना मुहम्मद क़ासिम साहब क़ासमी*
*निस्वार्थ भाव से सम्पूर्ण मानवजाति की सेवा के संकल्प के साथ प्रवेश एवं द्वितीय कैंप का समापन*
शैखुलहिंद ट्रेनिंग सेंटर जामिया इस्लामिया महमूदिया बेलौड़ी बनारस में चल रहे भारत स्काउट एंड गाइड जमीयत यूथ क्लब के प्रवेश एवं द्वितीय कैंप का आज पारंपरिक रूप से राष्ट्रगान एवं विसर्जन से समापन हुआ। कार्यक्रम में *मुख्य अतिथि के रूप में जमीयत उलमा ए बनारस के उपाध्यक्ष मौलाना मुहम्मद क़ासिम साहब क़ासमी* तशरीफ लाए। आपने बच्चों को संबोधित करते हुए कहा कि मानवता के आधार पर मानवजाति की सेवा करना बहुत बड़ी इबादत है और अल्लाह की रज़ा हासिल करने के बेहतरीन ज़रिया है। हमे खुद को अपने घर वालो के लिए, अपने समाज के लिए एवं अपने राष्ट्र के लिए उपयोगी बनाना है। हम दूसरों के लिए उपयोगी तब ही बन सकते हैं जब हम खुद के लिए उपयोगी हो और मानसिक एवं शारीरिक रूप से स्वास्थ्य हों। और ये चीज़ बेगैर मेहनत के नही आ सकती। इसलिए आपके टीचर आपको जो बताया है उसपर अमल करें और जमीयत यूथ क्लब की तरफ से जब भी आपको आवाज़ दी जाए आप मैदान में मौजूद हों।
*मौलाना अम्मार यासिर साहब नोमानी सेक्रेटरी जमीयत उलमा दक्षिणी बनारस* ने बच्चों से कहा कि सभी लोग अपने एक डायरी बनाए एवं रोजाना कम से कम तीन ऐसे नेक काम करें जो उस डायरी में लिखें।
*मुफ्ती अबू स्वालेह साहब क़ासमी सेक्रेटरी जमीयत उलमा बनारस* ने कहा कि जमीयत यूथ क्लब का एक बड़ा उद्देश्य चरित्र निर्माण भी है लिहाज़ा हम ये तय करें कि अपने रोज़ाना के कामों को सुन्नत तरीक़े पर अदा करेंगे।
*जमीयत यूथ क्लब बनारस के कनवीनर जनाब मुहम्मद रिज़वान साहब* ने अपने संबोधन में बच्चों से कहा कि जमीयत यूथ की प्रतिष्ठा अब आपसे जुड़ी हुई है, हमारा कोई भी काम ऐसा न हो हमारी प्रतिष्ठा को धूमिल करे। अंत में कैंप के सफल आयोजन के लिए *शिविर संचालक जमीयत यूथ क्लब के एडीओसी जनाब मास्टर Rover Wazaman साहब और मौलाना Noorul Bashar साहब* का शुक्रिया अदा किया जिनकी दिनरात की मेहनत से ये कैंप सफल हुआ। इसी तरह से क्वार्टर मास्टर की भूमिका निभाने वाले जनाब बशीर अहमद साहब, जावेद भाई, सईद अख्तर, खुर्शीद जमाल एवं मोहसिन का भी बहुत बहुत शुक्रिया जिन्होंने अपना 3 दिन बच्चों की सेवा में लगा दिया। मदरसा के प्रबंध समिति के सभी सदस्यों का एवं मदरसों के समस्त स्टाफ का शुक्रिया जिनके सहयोग से कैंप का आयोजन हो पाया।
आज के इस समापन समारोह में उपर्युक्त व्यक्तियों के अतिरिक्त जमीयत यूथ क्लब बनारस के वरिष्ठ सदस्य हाफ़िज़ अबू हम्ज़ा साहब और मदरसे के अन्य गणमान्य शिक्षकगण उपस्थित थे।
Jamiyat Ulema e hind Darul uloom dewband in India
जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी के निमंत्रण पर देश के बुद्धिजीवियों, राजनीतिक और धार्मिक नेताओं की एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी आयोजित
नई दिल्ली, 19 अगस्त 2023। “वर्तमान परिस्थिति पर आपसी संवाद“ के शीर्षक से शनिवार को एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी जमीअत उलेमा हिन्द, नई दिल्ली के प्रधान कार्यालय के मदनी हॉल में आयोजित की गई, जिसमें समाज के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी हस्तियों, अर्थशास्त्रियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, विचारकों और प्रोफेसरों ने भाग लिया। संगोष्ठी में देश के सामने मौजूद साम्प्रदायिकता की चुनौती, सामाजिक ताने-बाने के बिखराव और इसके रोकथाम के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा की गई और जमीनी स्तर पर काम करने और संवाद की आवश्यकता पर सहमति व्यक्त की गई। सभी बुद्धिजीवियों ने माना कि साम्प्रदायिकता इस देश के स्वभाव से मेल नहीं खाती और न ही मातृभूमि के अधिकांश लोग ऐसी सोच के पक्षधर हैं, लेकिन ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जो लोग सकारात्मक सोच के समर्थक हैं, उन्होंने या तो खामोशी की चादर ओढ़ ली है या उनकी बात समाज के अंतिम भाग तक नहीं पहुंच पा रही है, जिसकी वजह से जो लोग देश के सामाजिक ढांचे को बदल देना चाहते हैं या नफरत की दीवार खड़ी करके अपनी राष्ट्रविरोधी विचारधारा को सफल बनाना चाहते हैं, वह जाहिरी तौर पर हावी होते नजर आ रहे हैं। हालांकि यह वास्तविकता नहीं है। इसलिए समाज के बहुसंख्यक वर्ग को मौन रहने के बजाय कर्मक्षेत्र में आना होगा और भारत की महानता एवं उसके स्वाभाविक अस्तित्व को बचाने के लिए एकजुट एवं सर्वसम्मत लड़ाई लड़नी होगी।
अपने उद्घाटन भाषण में जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष और कार्यक्रम के सूत्रधार मौलाना महमूद असद मदनी ने बुद्धिजीवियों का स्वागत करते हुए सवाल किया कि ऐसी स्थिति में जब देश के एक बड़े अल्पसंख्यक वर्ग को उसके धर्म और आस्था की वजह से निराश करने या अलग-थलग करने की कोशिश की जा रही है, हमें इसके समाधान के लिए क्या आवश्यक कदम उठाने चाहिएं? मौलाना मदनी ने कहा कि जमीअत उलमा-ए-हिंद के बुजुर्गों ने गत सौ वर्षों से आधिकारिक तौर पर और दो सौ वर्षों से अनौपचारिक रूप से देश को एकजुट करने की कोशिश की और देश की महानता को अपनी जान से ज्यादा प्रिय बनाया। जब देश के विभाजन की नींव रखी गई तो हमारे पूर्वजों ने अपनों से मुकाबला किया। देश के लिए अपमान सहा और आजादी के बाद राष्ट्रीय एकता के लिए अपने बलिदानों की अमिट छाप छोड़ी और तमाम कठिनाइयों के बावजूद हम आज तक अपनी डगर से हटे नहीं हैं। वर्तमान स्थिति में भी हम संवाद के पक्ष में हैं, हमारी राय है कि सबके साथ संवाद होना चाहिए और एक ऐसा संयुक्त अभियान चलना चाहिए कि देश का हर धागा एक-दूसरे से जुड़ जाए।
सुप्रसिद्ध सामाजिक विचारक विजय प्रताप ने अपने विचार व्यक्त करते हुए आपसी संवाद पर जोर देते हुए कहा कि जमीअत उलमा-ए-हिंद ने जो बलिदान दिए हैं, वह व्यर्थ नहीं गए। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि भारत के विभाजन के अत्यंत साम्प्रदायिक वातावरण के बावजूद देश का संविधान धर्मनिरपेक्ष आधार पर बनाया गया। इस्लामिक शिक्षाओं और विचारों का जो विकास भारत में हुआ, बड़े-बड़े इस्लामी विचारक यहां जन्मे, जिनके उल्लेख के बिना वैश्विक स्तर पर इस्लाम का जिक्र अधूरा और अपूर्ण है। इसके अलावा देश के विकास के जितने विषय हैं, उनमें मुसलमानों की देश के अन्य लोगों की तरह बड़ी भूमिका है। इसलिए हमें वर्तमान परिस्थितियों से निराश होने की जरूरत नहीं है, हर समुदाय के साथ ऐसी स्थितियां होती हैं और जो समुदाय जागरूकता का परिचय देता है, वह हालात से निपटने में सक्षम होता है।
अर्थशास्त्री प्रो. अरुण कुमार ने कहा कि देश में आर्थिक असमानता के कारण दक्षिणपंथी तत्वों को अपने विचारों को बढ़ावा देने का मौका मिल जाता है। उन्होंने कहा कि सरकार ने जो दावा किया है कि 13 करोड़ से अधिक लोग गरीबी रेखा से ऊपर उठ गए हैं, यह पूरी तरह से निराधार है। असंगठित क्षेत्र के 94 प्रतिशत से अधिक लोग दस हजार से कम मासिक वेतन पाते हैं, जो गरीबी रेखा से कभी नहीं उबर सकते।
सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील संजय हेगड़े ने कहा कि हम एक अजीब दौर में हैं, आज लोग संविधान को बदलने की बात कर रहे हैं, इसलिए जरूरी है कि संविधान की रक्षा की जाए और यह तभी संभव है जब हम संविधान को सही अर्थों में लागू करें और संविधान को समाप्त करने वालों को यह संदेश दें।
दूसरे सत्र में स्थिति के समाधान पर अपने विचार प्रस्तुत करते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास के प्रो. डॉ. सौरभ बाजपेयी ने कहा कि मुझे इतिहास के अध्ययन के दौरान जिन संस्थानों पर गर्व महसूस हुआ, उनमें से एक जमिअत उलमा-ए-हिंद भी है। इस संस्था के नेता हजरत मौलाना हुसैन अहमद मदनी ने पाकिस्तान बनने का विरोध किया। उनके साथ इस देश के अधिकांश मुसलमान थे। यह बात सत्य से परे है कि 90 प्रतिशन मुसलमानों ने मुस्लिम लीग को वोट दिया। वह आम मुसलमाना नहीं थे, बल्कि सामंत मुसलमान थे, जिनको ही वोट देने का अधिकार था। दिल्ली की जामा मस्जिद के पास पाकिस्तान समर्थकों और विरोधियों की एक सभा हुई। समर्थन करने वालों की सभा में केवल पांच सौ लोग थे और जो विरोधी थे, जिनका नेतृत्व जमीअत उलमा कर रही थी, उनकी सभा में दस हजार की भीड़ थी। उन्होंने कहा कि जो कौम अपना इतिहास भुला देती है, वह खुद को मिटा देती है। भारत के अधिकांश मुसलमानों ने विभाजन का विरोध किया था, यह एक इतिहास है। एक तरफ केवल मुस्लिम लीग थी तो दूसरी तरफ जमीअत उलमा के साथ 19 मुस्लिम संगठन थे। इसलिए देश पर मुसलमानों का अधिकार उतना ही है जितना किसी और का। उन्होंने कहा कि आपसी संवाद तभी सफल होगा जब दोनों पक्ष अपनी विचारधारा और सोचने का तरीका सही कर लें।
सुप्रसिद्ध लेखिका रजनी बख्शी ने मौजूदा हालात में गांधीवादी अहिंसा आंदोलन की वकालत की और कहा कि अहिंसा का मतलब अत्याचार के खिलाफ चुप रहना नहीं है और न ही इसके लिए किसी को महात्मा बनने की जरूरत है, बल्कि हमें बुरे से बुरे लोगों में भी अच्छाई का भाव जागृत करना है और बुराई की वजह से किसी व्यक्ति से नफरत नहीं करनी है।
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के संस्थापक चांसलर रमाशंकर सिंह ने कहा कि वर्तमान संघर्ष कोई साम्प्रदायिक नहीं बल्कि यह देश के अस्तित्व की लड़ाई है। हमें ऐसी स्थितियों से मुकाबला करने के लिए सभी वर्गों और संगठनों का महासंघ बनाना चाहिए। इस देश में साधु-संतों और सूफियों के साझा संदेश तैयार कर के नई पीढ़ियों तक पहुंचाएं और आजादी के नायकों और उनके बलिदान को हर वर्ग तक पहुंचाएं। हमारी लड़ाई जिस ताकत से है, वह बहुत संगठित है, उसका तंत्र सुबह की शाखा से शुरू होता है, वह नई पीढ़ियों के बीच पहुंचते हैं, उन्हें मानसिक रूप से प्रशिक्षित करते हैं और हमने जो खाली जगह छोड़ दी है, उसे वह अपने रंग से भरते हैं।
जाने-माने ईसाई नेता जॉन दयाल ने कहा कि आज संप्रदायिकता देश की व्यवस्था का हिस्सा बनती जा रही है, यहां अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होता है और फिर सजा भी उन्हें ही दी जाती है। देश के संविधान ने अल्पसंख्यकों के अधिकार तय कर दिए हैं, अगर यह अधिकार छीन लिए गए तो संवाद का क्या फायदा है?
सिख इंटरनेशनल फोरम के सदस्य सरदार दया सिंह ने कहा कि मुसलमान जो आज हालात का सामना कर रहे हैं, हमने पूर्व में भी ऐसे हालात देखे हैं, हम मुसलमानों के साथ खड़े हैं बल्कि हर प्रताड़ित व्यक्ति के साथ खड़े हैं।
अंत में जमीअत उलम-ए-हिंद के महासचिव मौलाना हकीमुद्दीन कासमी ने सभी अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन किया। ओवैस सुल्तान और मेहदी हसन ऐनी दवबंद ने मेहमानों का स्वागत किया और उनकी मेहमानदारी की। जमीअत उलमा-ए-हिंद के सचिव मौलाना नियाज़ अहमद फारूकी ने संगोष्ठी का संचालन किया। उन्होंने वर्तमान स्थिति पर बहुत प्रभावी प्रजेंटेशन दिया।
अपने विचार व्यक्त करने वाली अन्य हस्तियों में डॉ. इंदु प्रकाश सिंह, विजय महाजन, विजय महाजन, प्रो. रितु प्रिया जेएनयू, प्रो. एमएमजे वारसी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, डॉ. लेनिन रघुवंशी संस्थापक पीवीसीएचआर, कैलाश मीना आरटीआई कार्यकर्ता, भाई तेज सिंह, तबस्सुम फातिमा, मरीतोन जयसिंह शोधकर्ता, पुष्प राज देशपांडे, फादर निकोलस, जयंत जगियासोजी, अनुपम जी, अवी कठपालिया, हरीश मिश्रा बनारसवाले, डॉ. हीरालाल एमएलए, फादर निकोलस बराला, मोहनलाल पांडा, एडवोकेट सतीश टम्टा, फादर विजय कुमार नाइक, अभिषेक श्रीवास्तव विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
Politics of Muslims in sithwetion. मुसलमानो की राजनीती में स्थिति !
Politics of indian muslims of
sithwetion.
# भारतीय मुसलमानो को राजनीति में स्थिति !!
जी हां दोस्तों आप के साथ आज एक नया टॉपिक ले कर हाजिर हुआ हूं, जो की एक मुस्लिम समुदाय का पॉलिटिक्स से जुड़ा मसला है । वर्तमान समय में हिंदुस्तान के अंदर बीस से पच्चीस प्रतिशत मुस्लिम आबादी है जो की हिंदू समुदाय के बाद दूसरे नम्बर पर मुसलमानो की आबादी है ।एक बड़ी आबादी जनसंख्या के हिसाब से मायने रखती है । आज हमारे मुल्क हिंदुस्तान में राजनीति बहुत ही हावी हो चुकी है ,इससे कोई भी व्यक्ति राजनीति से बिना प्रभावित हुए रह ही नहीं सकता । हिंदुस्तान की हर रियासत में राजनीति की लहर इस तरह चल बसी है की हर आम आदमी का बचना बहुत ही मुश्किल हो गया है ।लेकिन वर्तमान दौर में बात मुस्लिम समुदाय की हो रही है की इस राजनीति में मुसलमान कहां पर खड़ा नजर आ रहा है ? क्या मुसलमानो की राजनीति में हैसियत है ? अगर राजनीति में उनकी हैसियत है तो उनका क्या मर्तबा है?किस पॉलिटिक्स पार्टी में क्या उनका योगदान है ?
क्या मुस्लमान हाशिए पर धकेला गया ?
इन सब सवालों को जानने के लिए हम विश्लेषण करेंगे और मुस्लमानों की राजनीती स्थिति को समझेंगे ।जी हिंदुस्तान के मुसलमानो को विरासत में मिली पार्टी कोंग्रेस ही है ,जो हिंदुस्तानी मुसलमानो ने इस पार्टी को सींचा और पाल पोस कर बड़ा किया और राष्ट्रीय स्तर की पार्टी तक और एक सबसे बड़ी मजबूत पार्टी मुसलमानो ने बनाई । और ये बात हिंदुत्व की आइडियोलॉजी को मानने वाले हिंदुओं ने भी कहा है की ,दरअसल कांग्रेस पार्टी तो मुसलमानो की है , क्योंकि मुसलमान राष्ट्रीय स्तर पर सबसे ज्यादा वोट भी कांग्रेस को ही देते हैं।मुसलमानो ने इस पार्टी को हमेशा गले लगाए रखा ,और जब बात वोट देने की आती है तब इन्होंने100 में से 95 प्रतिशत वोट हमेशा कांग्रेस को दिए ,। बाकी 5 प्रतिशत वोट इधर उधर अन्य पार्टियों को गए होंगे जिसमे कोई दो राय नहीं । आज हिंदुस्तान में दो बड़ी राष्ट्रीय स्तर की पार्टियां है जो एक पार्टी अपने आप को सेकुलर मानती है वो है कोंग्रेस और दूसरी पार्टी राष्ट्रवाद का दावा करती है वो है भाजपा एक पार्टी मुसलमानो की रहबरी का दावा करती है ,तो दूसरी पार्टी मुस्लामनो को सिरे से खारिज करती है और ये कह कर की हमे मुसलमानो के वोट चाहिए ही नही । तो फिर मुस्लिम एक पार्टी से डर कर सेकुलर का दावा करने वाली पार्टी से जा गले मिलते है , और दावा करती है की मुसलमानो के हम रखवाले है । फिर मुसलमान बेचारा थका हारा,मांदा,आखिर जाए तो जाए कहां ?आज हमारे मुल्क में हर रियासत में अलग अलग राजनीतिक पार्टियां अथवा दल है ,भाजपा जो वर्तमान में राष्ट्रीय स्तर की बड़ी पार्टी बन चुकी हैं जो की उनको मुस्लिम वोटर्स की जरूरत है ही नही ,तो फिर मुस्लिम वोटर्स की जरूरत है किसको ,जरूरत तो उनको है जो अपने आप को सेकुलर मानती है की हम आप की रक्षा करते है। , इस स्थिति को ज़रा समझना होगा कि वर्तमान दो राजनीतिक दल एक कांग्रेस और भाजपा दोनों में बुनियादी फर्क ये है की एक मुस्लिम वोटर्स को ये चैलेंज करती है की आप के के वोटों की हमें जरूरत है नही, तो ये उनका एक पीछे बहुत बड़ा राज़ है ,की हम से हिंदू वोटर्स जुड़े रहे और हम सत्ता में हमेसा बने रहे और मुस्लिमों के चांद वोटों की जरूरत है नही ताकि हमें इस जुमले से हिंदू वोट मिल जायेंगे और सत्ता के अनुकूल सब कुछ चलता रहेगा , लेकिन ये कह कर मुस्लमान डर कर हम से दूर हो जाए ।
फिर जब दूसरी पार्टी कांग्रेस जो मुस्लामानो को अपना रखवाला समझती है , हालांकि वो मुसलमानो को टिकट भी देती हैं,उतना ही देती है जितना ऊंट के मुंह में जीरा,लेकिन बीजेपी के मुकाबले जरूर टिकट ज्यादा देती है ,और मुसलमानो के वोट्स कांग्रेस को 95 प्रतिशत जाते है । हिंदुस्तान की मुख्तलिफ रियासतों में में क्षेत्रीय दल है ,वो भी मुसलमानो को अपनी गोद में लेके बैठे है और ये कह कर की आप उधर इधर मत भागिये वरना बीजेपी आप को मार डालेगी। जो बीजेपी नही करती वो क्षेत्रीय दल और सेक्युलर दल ही काम तमाम करते है ,फिर हमारे जुम्मन मियां साहब को समझते है बड़े प्यार से की देखो ज्यादा आप बोलोगे तो बीजेपी आ जायेगी और आप को खतरा हो जायेगा , जैसे एक कहावत है न की शरारती बच्चे को जब मां चुप कराने के लिए कहती ही की बेटा बदमाशी मत कर ,वरना बिल्ली आ जायेगी और उठा के ले जायेगी । यही स्तिथि सेकुलर पार्टी का दावा करने वाली क्षेत्रीय दलों का है जो मुसलमानो को इस तरह करके अपने पाले में रखते है । ताकि हम लोग सेकुलर का ढोंग रचते रहे और जो खेल खेलना हैं वो भी पूरा करते रहें।इससे वो भी अपने आप को महसूस करने लगता है को वास्तव में अगर दूसरी पार्टी आएगी तो हमे खतरा उत्पन्न हो जायेगा ,इससे विकास की तो बात छोड़िए लेकिन 5 साल शांति से तो रह पायेंगे और अपनी आजीविका सही से कमा पाएंगे।इसी आसरे को लेकर कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों को वोट देते है ।
इन सब बातों के बावजूद सेकुलर पार्टी का दावा करने वाली मुसलमानो को किस स्तिथि में रखती है ये देखना सबसे अहम जरूरी है, मुसलमानों को अपने प्रचार प्रसार में चुनावी रैलियों की भीड़ भाड़ दिखाने के लिए ,और रोज़ा इफ्तार पार्टी की दावत करने के लिए , दरी बिछाने के लिए इस्तेमाल करते है ,कुछ मामूली उम्मीदवारों को टिकिट देकर ये कह कर की बीजेपी तो मुसलमानो को एक भी उम्मीदवारों को टिकट नहीं देती है ,जब सेकुलर पार्टी का दावा करने लीडर जब सत्ता में आ जाते है तो किसी एक मुस्लिम को अल्पसंख्यक मंत्री का दर्जा दे देते है ,और सत्ता की मलाई तो खुद खाते है ,मुस्लिम आवाम का कोई विकास नहीं , वो बेचारा हुश में खुश लेकिन विकास का कोई अता पता नहीं केवल केवल ये पल्ला झाड़ने के लिए की हम ने तो मुसलमानो को टिकट भी दिया और अल्पसंख्यक मंत्री भी बना दिया । इस वाक्य का पीछे का मतलब इतना ही है की सिर्फ और सिर्फ मुसलमानो को राजनीति में इस्तेमाल करो use and throw वाली कंडीशन है । आखिरकार मुसलमानो को सभी राजनीतिक दल हाशिए पर धकेलना चाहते है और धकेल दिया गया है ।
आज भी सत्ता में बैठे क्षेत्रीय राजनीतिक दल बड़े बेड़े दावे करते है की हम लोग 36 कॉम का विकास करते है ,लेकिन ये उनके दावे धरातल पर सिर्फ धरे के धरे रह जाते है । लेकिन जब अल्पसंख्यक के गांव और कस्बे में जब जाते है तब वाह के हालात बता देते है की मुसलमानो के गांव या ढाणी और कस्बे में क्या हाल है ?मुसलमानो के अधिकतर गांवों में पीने के लिए पानी उपलब्ध है ही नहीं है , वहां स्कूल भी नही अगर स्कूल है तो भी पढ़ने वाला अध्यापक नही है , उस गांव या ढाणी में बिजली उपलब्ध नहीं है,मिनी अस्पताल भी नही इलाज के लिए दूर दराज के शहरो में जाना पड़ता है जिसे उन ग्रामीण लोगो को तकलीफों का सामना करना पड़ता है । आज भी ऐसे गांव है जहां पर आवागमन के लिए पकी सड़क है नहीं जिससे ग्रामीण लोग आज भी पैदल जातें है , हां ये बात जरूर है की वहां पर पुलिस थाना जरूर होगा , क्युकी उससे सरकार को और प्रशासन को फायदा होता है ,लेकिन मूलभूत सुविधाओं की कमी होगी कहां पर , जहां पर वहां पर मुस्लिम आबादी जायदा है ।
मुसलमानों को किस चीज की जरूरत है ?
आज के युग में अगर मुसलमानो को जरूरत है तो उनको समाजिक न्याय, आर्थिक न्याय,और पॉलिटिकल न्याय इन तीनो की न्याय की जरूरत है इन तीनों न्याय के आसरे ही किसी भी कॉम या समुदाय का असली विकास होता हैं और उस समुदाय का उत्थान होता है ,लेकिन काफी हद तक मुसलमानो के पास ये विकास के आयाम बिलकुल पहुंच ही नही पाते जिससे मुसलमान की स्तिथि दलित और आदिवासियों से भी बदतर है ।
आज के संदर्भ में देखा जाए तो मुसलमानो के पास नोकरियों में आरक्षण नही है ,दूसरे समुदाय के पास आरक्षण है जिससे उनका अनुपात ज्यादा है ,मुसलमान रोजगार में पिछड़ा हुआ है जिससे उनकी इकोनॉमिक कंडीशन बहुत ही खराब है ।मुसलमानों के पास राजनीतिक इंपोवार नही है जिससे उनका प्रतिनिधित्व बराबर नही मिल पता है इसलिए उनके क्षेत्र की आवाज सदन में नही सुनाई देती ।मुसलमान छात्रों को पढ़ने के लिए स्कॉलरशिप सरकार नही देती जिससे छात्र पढ़ाई से ड्रॉप आउट हो जाते है ,मुसलमानों की बस्ती में उप स्वास्थ्य केंद्र नही खोलती जिससे उनकी स्तिथि और भी खराब होती है ।
लेकिन देखे जाए तो हिंदुस्तान की आज़ादी से लेकर आज तक 76 साल हो चुके हैं ,लेकिन मुसलमानो की स्थिति में सुधार अभी तक नही आया है ये में नही कह रहा हु बल्कि केंद्र सरकार का डाटा कह रहा और सच्चर समिति,रंगनाथ मिश्र की समिति कह रही है की हिंदुस्तान में को समुदाय या धर्म पिछड़ा हुआ है तो वो मुसलमान है लेकिन सरकार सब खामोश !मुसलमानों के विकास की बात आती है सेकुलर पार्टी में बैठे उनके अपने ही साथी ये कह कर कहते है की सिर्फ और सिर्फ सरकार मुसलमानो की है ,हमारी कुछ सुनती नही तब सरकार के मुखिया ठप हो जाते हैं ,फिर आगे देखेंगे तब तक काम रुक जाता है और बीच में नया एजेंडा लागू किया जाता ह तब तक मुसलमानो के विकास को भुला दिया जाता है । आखिर कार मुसलमान हाशिए पर धकेला जाता है । हर पार्टी और क्षेत्रीय दल मुसलमानो के साथ अपनत्व का ढोंग रचते है लेकिन हकीकत में मुसलमानो को सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय ,और पॉलिटिकल न्याय कोई भी दल या पार्टी देने के लिए तयार नही है ।
जी हां मुसलमानो की वर्तमान राजनीति में हैसियत उतनी ही है जितनी ऊंट के मुंह में जीरा ,आज चाहे कोई भी पार्टी या क्षेत्रीय राजनीतिक दल हो ,लेकिन अपने आप को सेकुलर मानने से कुछ नही होगा बल्कि सेक्युलरिसिम पर चलना होगा ,और हर गरीब मुस्लमान और दलित वर्ग को भी साथ में बिठाना होगा उनके हित में काम करना होगा उनके सामाजिक ,और आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए काम करना होगा तभी सेकुलर पार्टी का दावा करने वाले बड़े बड़े राजनीतिक दल अपने आप को प्रमाणित नही कर पाएंगे।सिर्फ और सिर्फ मुंह में खजूर डालने से और दरी बिछाने से कुछ उनका विकास नही होगा । अगर आप लोग इस तरह का सेक्युलर दावा करते रहोगे तो उनका शोषण होता रहेगा , फिर जनता बड़ी जनार्दन है ,कोई और विकल्प देख लेगी, जिससे आप की अहमियत को कहीं खतरा न हो जाए ।
नोट: ये मेरे निजी एव स्वतंत्र विचार है किसी राजनीतिक दल से प्रत्यक्ष संबंध नही है ।
धन्यवाद
आप का दोस्त ,साथी ,लेखक , स्वतंत्र विचारक
मुराद खान जयसिंधर
जय हिंद जय भारत
अल्लाह की गैबी मदद, اللّٰہ کی غیبی مدد
अल्लाह की गैबी मदद कब तक 🤔
*स्पेन* हाथों से निकल जाते वक़्त ग़ैबी मदद नहीं आई, *न खिलाफत ए उस्मानिया* खत्म होते वक़्त आई, न *इज़राइल* के क़याम को रोकने आई, न *बाबरी मस्जिद* शहीद होते और छिनते वक़्त आई, न *इराक़* और *सीरिया* बर्बाद होते वक़्त आई, न *म्यांमार(बर्मा)* मुसलमानों के क़त्ल ओ ग़ारत पर आई......
फिर भी घरों और मस्जिदों में बैठकर ग़ैबी मदद की सदा..????
ग़ैबी मदद कब आती हे👇
ग़ैबी मदद *जंग ए बद्र* में आई थी जब हज़ारों के मुकाबले सिर्फ 313 मैदाने जंग में उतरे।
ग़ैबी मदद *जंगे खन्दक* में आई,जब *मेहबूब ए इलाही ﷺ* ने पेट पर पत्थर बांधकर ख़ुद ख़न्दक खोदी और मैदाने जंग में उतरे।
अल्लाह की मदद *जंगे ओहद, हुनैन, तबूक, और फतह ए मक्का* के वक़्त आई थी,
अल्लाह की मदद, *उमर बिन ख़त्ताब, ख़ालिद बिन वलीद, तारिक़ बिन ज़ियाद, सलाह उद्दीन अय्यूबी, मोहम्मद बिन क़ासिम, अरतुगरुल बिन सुलेमान* जैसे *मर्दे मुजाहिद ग़ाज़ीयों, जियालों* के पास आती है।
और हम हैं कि...
तागूती निज़ाम पर राज़ी हैं,..
*और ग़ैबी मदद के मुन्तज़िर-???*🤔
क़ीमती लिबास पहनकर, *माल* और *ज़र* जमा करके, लक्ज़री ऐरकंडिशन गाड़ियों में बैठकर,
झुके-झुके लोगों से हाथ चुमवाकर, मिम्बर पर बैठकर लोगों की वाह वाह की खुहाइश लेकर, मुसल्ले पर बैठकर दुआओं में, ज़ालिम को सिर्फ बद्दुआ देकर...
*ग़ैबी मदद के मुन्तज़िर???*🤔
मातम, नात खुआनी, महफ़िल ए मिलाद, वज़ीफ़े, इमली दाने या तस्बीह के दानों को 10लाख, 20लाख बार घुमाकर....
*ग़ैबी मदद के मुन्तज़िर...??*🤔
*आफ़ाक़ी दींन* को चन्द जुज़याते इबादत में महदूद और कैद करके...
*ग़ैबी मदद के मुन्तज़िर..??*🤔
नोजवान नस्ल को *उक़ाब* से *मुर्ग़ा* बनाके, *मुजाहिद* से *मुजाविर* बनाके, *निज़ाम ए इलाही* की जद्दो-जहद और *जज़्बा ए शहादत* से दूर करके, *तागूती निज़ाम* को ख़ुशी ख़ुशी तस्लीम करके, ज़ालिम और बातिल को सिर्फ बद्दुआ देके....
*ग़ैबी मदद के मुन्तज़िर??*🤔
*फिलस्तीन, सिरिया, इराक़, सूडान, नाइजीरिया*, के हालात जानकर भी हलक़ तक खाना खाके, मीठी और गहरी नींद सोके..
*ग़ैबी मदद के मुन्तज़िर??*🤔
यानी सब कुछ *अल्लाह* के ज़िम्मे करके, ख़ुद बुज़दिली इख़्तेयार करके..
*ग़ैबी मदद के मुन्तज़िर??*🤔
*सीरत ए नबी ﷺ* और *सीरत ए सहाबा* तो हमें बताती हैं कि पहले ये *मैदान ऐ जंग* सजाते फिर अल्लाह से ग़ैबी मदद के लिए हाथ उठाते🤲,
और हमारे हाथ सिर्फ अपनी ख्वाहिशात पूरी करने और ज़ालिम ओ बातिल को बद्दुआएं देने के लिए उठते हैं।
*ऐसी सूरत में सिर्फ अल्लाह का अज़ाब आता है ,, ना कि ग़ैबी मदद।।*
*आज हमारी हालत ऐसी है कि हम गफलत की नींद सो कर गैबी मदद का इंतजार कर रहे हैं, और हमारे हालात दिन पर दिन बद से बत्तर होते जा रहे हैं*
*अगर गैबी मदद से कौम के हालात सुधर ते तो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहो ताला अलेही वसल्लम जंग के मैदान में कभी ना उतरते*
*ए लोगो याद रखना अगर घरों में बैठकर गैबी मदद का इंतजार करा जाता तो जंग ए खैबर कभी ना होती और हज़रत अली शेरे खुदा खैबर कभी ना उखड़ते*
*अगर घरों मैं बैठकर गैबी मदद का इंतज़ार कर कौम के हालात सुधारे जाते तो हजरत खालिद बिन वलीद रजि अल्लाह ताला अन्हू जंग कभी ना करते*
*यहां पर जंग से मुराद लड़ने से नही है, बल्कि मैदान में उतरकर अपने हक के लिए खड़े होने से है, अपनी हक़ की लड़ाई लड़ने से है, ना के अपनी आराम गाहो में गफलत की नींद सोने से*
*तुम कहते हो कि तुम तादाद में कम हो याद रखना तुम्हारी ताकत तुम्हारी तादात नहीं तुम्हारा ईमान है मत भूलो वो 113 हम में से ही थे, तुम अपना ईमान मज़बूत करो अल्लाह तुम्हे मज़बूत कर देगा*
*कसम खुदा की तुम अपने दिल में खुदा का खौफ पैदा तो करो उसका डर पैदा तो करो कसम से दुनिया के खौफ से दुनिया के डर से आज़ाद हो जाओगे*
*याद रखना इंसान को मौत उस वक्त तक नहीं आती है जब तक मौत उसके नसीब में ना हो, मौत खुद ज़िंदगी की हिफाजत करती है, अपना वक्त पूरा होने तक, और जब मौत नसीब में होती है तो ज़िंदगी खुद मौत से जाकर गले लग जाती है।*
*ज़रा सोचो मरने के बाद अपने रब को क्या जवाब दोगे*। फिर कहते हैं की अल्लाह की गैबी मदद कब आएगी !
अल्लाह की गैबी मदद कब तक !
उस वक्त तक नहीं आएगी जब तक हम अंदर और बाहर से अल्लाह की रस्सी को मजबूती से पकड़ेंगे नही और मोहम्मद सल्लाहू अलैहि व सल्ल्म का तरीका नही पकड़ेंगे,अल्लाह के हुकुम को नही मानेंगे और नबी अलैहिस्सलाम का तरीक ए कार पर अमल नहीं करेंगे ,तो सोचो हमारे साथ क्या मामला होगा !
हमें ईमान पर चलना होगा ,और ईमान के लिए अमली काम करना पड़ेगा तभी कुछ अल्लाह की मदद आएगी ,और साहबाओं जैसा ईमान होना चाहिए तभी तो हालात अपने मुताबिक होंगे , ऐसे बैठे बैठे काम नही होंगे ।
आज हमे जरूरत इस बात की है की हमे चाहिए की अल्लाह के हुकुम के मुताबिक अपनी जिदंगी
Powar Of pen कलम की ताकत
# Kalm ki takat (कलम की ताकत )
Zang e aazadi men hindustani muslmano ka aham kirdar
जंग ए आज़ादी में हिंदुस्तानी मुसलमानो का अहम किरदार।
मुसलमान कयादत से महरूम!!
मुसलमानों की कयादत !!
जी हां दोस्तों जी हां दोस्तों है सलाम व आदाब ।आज बात मुसलमानो की हो रही है। हिंदुस्तान आजाद हुए को 75 साल हो गए चुके हैं, लेकिन हिंदुस्तान के अंदर मुसलमानों के राष्ट्रीय स्तर पर लीडरशिप या कयादत कभी उभर ही नहीं सकी । हिंदुस्तान के मुसलमानो ने कुछ हद तक मौलाना अब्दुल कलाम आजाद को एक सियासी लीडर्स जरूर माना था , मगर बड़े तबके ने उसे शख्सियत की लीडर खारिज कर दिया था,जिसकी प्रमुख वजह है मुसलमान के अंदर फिरका परस्थिति ।आज भी मुसलमान फिरका वरियत में बंटे हुए हैं, जिसे उनका सियासी और मजहबी लीडर राष्ट्रीय स्तर पर अभी तक मुस्लिम अवाम को एक प्लेटफार्म पर नहीं ला सका। हालांकि कुछ हद तक जमीयत उलमा और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसी संस्थाओं ने अहम भूमिका अदा की है। मुसलमानों के हर दुख और सुख में हमेशा खड़े रहे ,किसी भी तरह से मुस्लिम आवाम की बाढ़ जैसे हालात में ,या दंगे के वक्त ,और भी परिस्थति सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट का मामला हो ,जमीयत ने फिर्का परस्ती से ऊपर उठ कर काम किया है । कुछ हद तक वह संस्थाएं नाकाम साबित रही है । मगर हिन्दुस्तान की मुख्तलिफ रियासतों में देखा जाए तो केरला रियासत के अंदर मुस्लिम लीग की कयादत रही है ,हैदराबाद में ए आई एम आई एम पार्टी की कयादत कर रही है । असम के अंदर मुखलिफिन माहौल के अंदर मौलाना बद्रुदीन अजमल साहब कयादत कर रहे हैं, लेकिन उसके अलावा और शुबो के अंदर बहुत ही गिने चुने मुस्लिम लीडर है जो मुसलमान की छोटे स्तर पर कयादत कर रहे हैं । लेकिन यह सब एक नाकाम कोशिश से नजर आ रही हैं ।हालांकि इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर ए आई एम आई एम पार्टी जिसके मुखिया असदुद्दीन ओवैसी साहब अपने सूबे से बाहर निकाल कर हिंदुस्तान की मुख्तलिफ रियासतों में जाकर मुसलमान के हुकूक की बात कर रहे हैं,हालांकि वो भी काफी हद तक नाकाम साबित रहे है ,हालांकि ओवैसी साहब पक्के और सच्चे ईमानदार शख्सियत है , उसके बावजूद भी मुसलमान उसको अपना लीडर नहीं मान रहे हैं, जिस की वजह मुसलमान काफी लंबे वक्त से दूसरी कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियों में उनकी जड़ें मजबूत टिकी हुई है इसलिए बड़े लीडर ओवैसी से हाथ नही मिलाते हैं।इसलिए मुस्लमान लीडरों से बड़ी इल्तिजा है की वो सियासी और मजहबी लीडरशिप फिरका प्रस्ति से ऊपर उठ कर सारे मसलक के रहनुमा आवाम की रहनुमाई करते हुए सारे लीडर एक प्लेटफार्म पर जमा हो ,फिर आवाम उन सब को रहनुमाई को मंजूर करे ।मुसलमानों की कयादत मजबूत नहीं होने की वजह से बहुत सारे मुस्लमान विकास, और इंसाफ से महरूम रह जाते हैं मुसलमानो का सियासत में हिस्सा बिलकुल न के बराबर होना ,जिससे उनका बैकग्राउंड बिछड़ता चला जा रहा है। इससे हमारी कॉम में पसमंजर और ना इंसाफी का माहोल नजर आता है ।हम आवाम को चाहिए की हमें अपने अंदर झांकना होगा और दुनिया के माहौल को देखना होगा कि हम मुस्लिम कहां पर खडे है और हमारा क्या हाल है ,और हमारी कॉम और समुदाय का क्या हाल है ,उनके साथ क्या हो हो रहा है ये सब आप लोग आज कल सोसल मीडिया पर देख और सुन रहे हो ,कोई मजलूम मुसलमानों की आवाज उठा रहा है? तो अलर्ट हो जाइए और अपनी कयादत को मजबूत कीजिए ,सियासत में हिस्सा लीजिए और वोट देने वाले नहीं बल्कि वोट लेने वाले बनिए।हां जी और ये भी कहना चाहता हु ,अगर आप लोग मजहब से ऊपर उठ कर सियासी लीडर अपना नही कायम करेंगे तब तक आप की सुनने वाला कोई नहीं होगा ,जो भी आप के लिए मुल्क के अंदर आवाज उठारहा है उसका साथ दीजिए ,और उसकी कयादत को स्वीकार कीजिए चाहे उसकी जाति या समुदाय कोई भीहो , फिरका prsti से ऊपर उठ कर काम कीजिए।अपना ही लीडरबिना निषपक्ष से आप की आवाज को सदन में या सोशल मीडिया में उठाता हैं जरूर उसकी बात का असर पड़ताहै ।धन्यवाद दोस्तोंआप का साथी, लेखक मुराद खानजय हिन्द जय भारत
Who's reality leader of Muslim?मुसलमानों का असली लीडर कौन?
आप का साथी ,दोस्त - लेखक मुराद खान
हर घर तिरंगा अभियान
हर घर तिरंगा अभियान - श्री नरेन्द्र मोदी
ALL ARE INDIAN HAPPY INDIPENDENT DAY
जैसा कि आप को पता है की हमारे देश भारत को आजाद हुए 75 साल पूरे हो चुके हैं। अमृत महोत्सव का अंतिम पड़ाव है। हमारे मुल्क की केन्द्र सरकार जिसके प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने एक अभियान चलाया है की हमारा मुल्क अंग्रेजों की गुलामी से काफी संघर्ष से आजाद हुआ है , हमारे मुल्क को आजाद हुए को 75 साल पूरे हो चुके हैं , यानी अमृत महोत्सव समापन की ओर है,जिससे सभी हिंदुस्तानियों को हर घर पर तिरंगा झंडा फहराने की अपीली कर रहे हैं,और सोशल मीडिया पर पुरजोर तरीके से अपील की जा रही है। जिससे हर भारतीय अपनी शान शौकत से अपनी दुकान , घर,होटल और ऑफिस और अन्य संस्थान पर बड़े गर्व से फहरा रहा है। हालंकि राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा हमारे लिए बड़ी शान वाला है ये हमारे लिए फख्र की बात है ।जब हम लोग राष्ट्र के प्रतीको को देखते है तो बहुत ही हमारे अंदर एक गर्व की भावना जागृत होती है । यकीनन हमें इन राष्ट्रीय प्रतिको का आदर और सम्मान करना चाहिए।
धन्यवाद दोस्तों
आप का साथी - WRITER : MURAD KHAN
JAI HIND - JAI BHARAT
Motivetional speech of social workars
*"जमाना तुम्हें जाहिल, अनपढ़ और भीख मांगता देखना चाहता है, हिंदुस्तान के मुस्तकबिल का हिस्सेदार नहीं बनाना चाहता, याद रखो अगर तुम आज न...
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जी हाँ दोस्तों आज का अध्याय है शिक्षा क्यों जरूरी है? इस बात से आप बिल्कुल वाकिफ हैं, आज के ज़माने में ताअ़लीम ज़रूरी है बिना तालीम के इन...
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