दीनी तालीम ( धार्मिक शिक्षा) Religious education

जी हाँ आज का नया अध्याय है" दीनी तालीम।  बात 
बहुत बड़ी है। व्यक्ति का अस्तित्व परिवार से है, और परिवार का अस्तित्व समाज से है और समाज का अस्तित्व  एक विशेष समुदाय से है और समुदाय का अस्तित्व मज़हब से है। बिना मजहब के व्यक्ति का अभी दुनिया में अस्तित्व तो हो सकता है मगर दुनिया से चले जाने के बाद उसका कोई अस्तित्व नहीं होता है। इस दुनिया में जन्म लेने वाला हर इंसान अपने अपने धर्म से जुडा़ हुआ रहता है और वही व्यक्ति जो अपने मज़हब की सच्ची शिक्षा  और अपने मज़हब के ऊसूलो पर  आगे बढ़ पाता है वही कामयाब होता है। इस पृथ्वी नामक गृह पर जो दुनिया बसी है, उनमें से हर एक व्यक्ति का अस्तित्व अपने अपने धर्म से जुड़ा हुआ है, मगर कोई व्यक्ति अपने धर्म के वास्तविक नियमों एवं रीति रिवाजों पर नहीं चलता है तो उन को दर दर की ठोकरें खानी पड़ती है। चाहे धर्म कोई भी, क्यों न हो मगर उसके उसूलों पर चलना अनिवार्य है, अगर हम नहीं चलते हैं तो यह गलती हमारी है किसी ओर की नहीं। हकीकत में देखा जाए तो कोई भी व्यक्ति  मज़हब से अगर बाहर है तो वो इंसान के लायक नहीं है उस को जानवर कहा जाएगा क्योंकि उस इंसान के अन्दर इंसानियत नाम की चीज नही होगी। इन्सान धर्म से जुडा़ हुआ है धर्म ही इंसान को लेकर चलता है। दुनिया और आखिरत की वास्तविक सच्ची शिक्षा धर्म से ही मिलती है। जो व्यक्ति मज़हब के नियमों पर चलता है उनके अन्दर  अच्छे अखलाक, इन्सानियत, प्रेम मोहब्बत, आपसी भाईचारा, दुख दर्द, सच और झूठ, अपने और सही और गलत ये सब बातें इन्सान मज़हब से ही सीखता है। तब वो व्यक्ति धर्म के रास्ते पर चल कर दूसरे लोगों को अच्छी सलाह और सही राह पर चलने की प्रेरणा देता है।
हकीकत में असली शिक्षा धार्मिक शिक्षा ही है, कोई भी मज़हब  क्यों न हो , कोई भी मज़हब बुरी तालीम नहीं देता है, हर कोई धर्म अच्छी और सच्ची बात बताता है, अपने मज़हब की खूबी जरूर बताता है। हाँ यह भी बात सत्य है कि कोई भी धर्म आपस में भेदभाव रखने की सलाह  नहीं देता है। हाँ यह कुछ ऐसे लोग होते हैं जिन्हें अपने मज़हब की तालीम के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं होती है  जिसकी वजह से वै व्यक्तियों को  कयी तरफो में बांटते हैं और वे काल्पनिक विरोध उत्पन्न करते हैं। जिनकी वजह से हम उनको दौष देते हैं और लेकिन वे लोग धर्म के नियमों को समझते नही है।
##मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
    हम हिन्दी है हिन्दुस्तान हमारा।।
कोई भी मज़हब आपस में विरोध करने की शिक्षा नहीं देता है, विरोध या गन्दी हरकतों के कुछ दूसरे पहलू होते हैं जिनकी वजह से इन्सान के अन्दर उलफत और कलह पैदा होतीं हैं।
सभी धर्म अपनी अपनी जगह पर सब सही है मगर अपने अपने मज़हब की तालीम बहुत ही कम गिने चुने लोगों के पास होती है जिनकी वजह से लोगों के अन्दर नकारात्मकता, अंधविश्वास और छूआछूत जैसी भावनाएं भरी हुई है।इन्सान को धर्म ही बुरी बातों से बचाता है, इन्सान को पता है कि गलत कार्य करुंगा तो मुझे पापज्ञ( गुन्ना)  होगा और मुझे आगे भी सजा मिलेगी। इसलिए इन्सान थोड़ा सोच समझ कर कदम उठाता है। इन्सान की वास्तविक तालीम मजहबी तालीम है, बाकी दुनिया की तालीम तो रोजी रोटी कमाने के लिए है।

धन्यवाद, में आप का दोस्त लेखक  वक्ता, अध्यापक मुराद खान जयसिंधर। 






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