Natur प्रकृति🌿🍃:- जी हाँ
दोस्तों👭👬👫 आज में एक नये टोपिक लेकर हाज़िर हुए है और टोपिक अपने आप में खास है और विशिष्ट भी है क्योंकि प्रकृति के बारे में आप सभी जानते हैं कि इस कै बिना हमारा जीवन कैसे चल पाएगा ये असंभव है।
प्रकृति पर मनुष्य प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर है, मनूष्य के अलावा पशु🐮 पक्षी एवं वन्य प्राणी भी शामिल हैं, ये वन्य जीव पूर्ण रूप से प्रकृति🌿🍃 पर निर्भर है। लेकिन इस की हिफाज़त करना मनुष्य के जिम्मे है। प्रकृति को बिगाड़ना और सुधारना मनुष्य का ही काम है। मनुष्य प्राचीन काल में प्रकृति को देवी अथवा माँ मानकर उसकी पूजा करता था और प्रकृति से डर रखता था क्यों? क्योंकि उस काल में मनुष्य पूर्ण रूप से प्रकृति पर ही निर्भर था दूसरा विकल्प मनुष्य के पास था ही नहीं। मनुष्य का खाना, पीना, उठना, बैठना सारी क्रियाएँ पैड़-पोधौं के अन्दर ही होती थी। मनुष्य की सारी पूर्ति प्रकृति देवी करती थी क्योंकि उस काल में न तो इतनी जनसंख्या थी और न ही इतने पशु- पक्षी थे। उस काल में भी मनुष्य पशूओं का शिकार 🔫करके खाता था और अपना जीवन खानाबदोश व्यतीत करता था। आज भी इस आधुनिक युग में कुछ वर्ग प्रकृति की रक्षा कर रहा है जिसके परिणाम कुछ खास नजर नहीं आ रहै है। आज भी कुछ ऐसी जनजातियाँ जो अपना गुज़ारा प्रकृति🌿🍃 के अन्दर रह कर चलाते हैं तो भला इससे स्पष्ट हो गया है कि प्रकृति की रक्षा कोन कर रहा है। लेकिन इस का सदुपयोग तो सभी कर रहे हैं और दुरूपयोग भी सभी करते हैं तो इस का ज़िम्मेदार कौन? ज़िम्मेदार मनुष्य।
लेकिन आज मनुष्य प्रकृति🌿🍃 से हट कर दूर भले ही गया है लेकिन दूर रह कर भी पेड़ों-पोधों से जो सामग्री ले रहा है या उपयोग कर रहा है हां प्रकृति🌿🍃 की वस्तुएँ लेने से मना कोई नहीं करता है लेकिन उसका संरक्षण कोई नहीं करता ये सबसे बड़ी समस्या है।
लेकिन आज का युग आधुनिक टैक्नोलॉजी का है और सारा काम मशीनों से हो रहा और प्रकृति को कितना नुकसान या फायदा हो रहा है ये कोई आकलन नहीं करता । आज भी हमारे खाने की सारी की सारी वस्तुएँ हमैं पैड़-पोधौं से मिलती है, वहाँ से खाने के लिए फल और फूल तो ले रहे हैं उस 🌳 पेड़ का संरक्षण नहीं कर रहे हैं। ये सबसे बड़ी गलती है मनुष्य की। प्रकृति सभी को बराबर मात्रा में में हमें खाने की सामग्री दे रही है बल्कि वो ये नहीं पूछती कि आप का धर्म, जाती क्या है?
लेकिन इस संसार में कुछ ऐसे क्षेत्र है जहाँ पर मानव आपस में लड़ते हैं, धर्म और जाति के नाम पर।
प्रकृति🌿🍃 की ओर इस संसार की कुछ हद तक सरकारें भी ध्यान देने लगी है। नयी नयी योजनाएं चला रही है और लोगों को इस कार्य में प्रोत्साहित भी कर रही है फिर भी परिणाम सकारात्मक नहीं आ रहा है। परिणाम सकारात्मक तब आएगा जब आम जन में प्रकृति के प्रति रूचि जागृत होगी और उसकी कमी महसूस होगी।
प्रकृति के अन्दर जो प्राचीन काल में जो चीज़ें शुद्ध खाने को मिलती थी वो अब प्रकृति ने देना बंद कर दिया, क्योंकि अब जनसंख्या लगातार बढ़ रही है और प्रकृति का विनाश हो रहा है, पीने के लिए जल की भयंकर कमी हो रही है।
प्रकृति का सर्वनाश हो रहा है यह कहना कोई गलत नहीं है।
कोई भी मुल्क की सरकार हो चाहे वो लोकतांत्रिक हो या राजतांत्रिक, ये सरकारें प्रकृति पर कितना ध्यान दे पाती है? इस की मुझे कोई खास जानकारी नहीं है हां ये में कह सकता हूँ। हाँ हमारे हिन्दूस्तान की जो सरकार है उस के बारे में जरूर कुछ कहना चाहता हूँ। भारत सरकार के जब चुनाव का समय आता है तब विकास नाम का कोई मुद्दा नहीं होता है कुछ एक के सिवा। उस समय इनको धर्म, जाती, मन्दिर, मस्जिद की याद आती है और जब सत्ता मिल जाती है तब इधर से उधर करके पांच साल का समय निकाल लेते हैं विकास गायब तो प्रकृति ओर हरियाली की तरफ कौन देखेगा।प्रकृति की चीज़ें मीठी तो सब को लगती है मगर ध्यान कम लोग ही दे पाते हैं।
धन्यवाद🙏💕 दोस्तों, में आप का दोस्त लेखक, वक्ता, निजी अध्यापक एवं समाज सेवी। मुराद खान।।
।। जय हिंद जय भारत।।
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