दोस्तो आज बात एक ऐसी सामाजिक कुप्रथा मैं आपसे बात करने जा रहा हूं एक ऐसी सामाजिक रीति जिन्हें औसर या मृत्यु भोज के नाम से जाना जाता है। यह रिती हर मजहब वह हर समाज में प्रचलित है ,लेकिन मैं आज मुस्लिम समाज में इस औसर जैसी प्रथा के बारे में बात करना करने जा रहा हूं जिसका का प्रचलन मुस्लिम समाज में बहुत अधिक पाया जाता है इस प्रथा में दिक्कत वाली बात यह है कि किसी के घर कोई शख्स या बुजुर्ग इंसान का इंतकाल हो जाए तो उसके घर पर बड़े स्तर पर भोज की तैयार करते हैं ,और बड़ी-बड़ी दावते देते हैं,तो इस बात की हमारा इस्लाम मजहब यह ऐसा काम करने की इजाजत नहीं देता है , क्योंकि इस्लाम धर्म के मानने वाले प्रत्येक आदमी माल और पैसे के हिसाब से एक समान नहीं है कोई गरीब है कोई मध्यम वर्ग का है कोई अमीर आदमी है तो अपनी अपनी गुंजाइश के अनुसार खर्च करने की हिदायत देता है। इस्लाम मैं यह जो ओसर जैसी प्रथा है इस प्रथा में गरीब आदमी चाहे मध्यमवर्ग का आदमी कोई भी क्यों ना हो सबको ओसर यानी मृत्यु भोज करना और बड़े स्तर पर समाज को दावत देना और सात पकवान बनाना फिर फिर ज्यादा पब्लिक को खाना खिलाना यह सब गलत काम है। इस्लाम मजहब किसी को मजबूर नहीं करता हां हो सके तो गरीब आदमियों को मुक्तसर से दावत देकर सवाबे दारेन हासिल करें। अगर दीन इस्लाम में देखा जाए तो औसर जैसी प्रथा का कोई महत्व नहीं है ,लेकिन आज समाज के अंदर एक ऐसी रिती अपना मुकाम बना चुकी है की चाहे गरीब हो चाहे मध्यमवर्ग का हो उनको यह काम अमीर आदमी के बराबर करना चाहिए इस काम के अंदर कम से कम 4 से 5 लाख. तक खर्च हो जाते हैं और दूसरी जो रिती है शादी के दिन बड़े बड़े स्तर पर उस पर हजारों लाखों रुपए खर्च होते हैं मेरे कहने का मतलब इतना है की आज की दिनांक में हर आदमी पैसे वाला नहीं होता ,कोई गरीब है, लेकिन उसको आप मजबूर मत करें हो सके तो उसकी आप लोग सहायता करें इसका सवाब इसका जवाब आप लोगों को मिलेगा क्योंकि अल्लाह की राह में खर्च करना और गरीब लोगों की सहायता करना यह अल्लाह को बहुत बड़ा पसंद है । अल्लाह को सखावत पसंद है।अल्लाह उसको दुनिया मैं. खूब रिज्क देता है। बात इस नजरिए से की जा रही है आज हमारे समाज में शिक्षा पर और अच्छी जगह पर हम लोग ₹1 भी खर्च करना नहीं चाहते हैं ,मगर शादी ब्याह के अवसर जैसी रिती हो या कोई और फंक्शन हो या कोई जन्मतिथि की पार्टी हो उस पर हम लोग लाखों करोड़ों रुपए खर्च कर देते हैं। वह लाखों रुपए हम चाहे सेठों से ब्याज लाना है चाहे जमीन बेच कर लाए चाहे.जेवर गिरवी रख कर लाए मगर खरच फालतू कामों में करेंगे लेकिन हमें जिस रास्ते पर जाना है इल्रमे दीन. इलमे दुनिया उस रास्ते पर अपने बच्चों को नहीं भेजेंगे ।जब बच्चा दुनिया में आता है 6 से 7 साल का होता है उसके बाद उस बच्चे को मदरसे और स्कूल मैं भेजा जाता है उसके बाद वह बच्चा मदरसे की तालीम धीरे धीरे सीखता है ।साथ-साथ में दुनिया की तालीम भी सीखता है ।जब उस बच्चे को बड़े स्तर पर पढ़ाई करने के लिए अधिक रुपयों की जरूरत पड़ती है तब और उस के मां.बाप के पास.पैसे नहीं होते हैं क्योंकि उन्होंने अपने रुपए सोच समझकर खर्च नहीं किये । उन्होंने रुपए फालतू के कामों में सबसे ज्यादा खर्च किए अच्छे कामों में कम खर्च किए लेकिन जहां हमें खर्च करने हैं वह हम खर्च कर नहीं पाए जहां खर्च नहीं करने थे वह हमने. खर्च नहीं.कीये। यह हमारी सबसे बड़ी गलत आदत है। लेकिन आज का वक्त देखा जाए तो बहुत ही नाजुक है क्योंकि इस वक्त में दुनिया को समझना बहुत जरूरी है ।आज दुनिया के अंदर सबसे ज्यादा आधुनिक टेक्नोलॉजी से बनी हुई चीजें और उनकी सुविधाएं हमें मिल रही है। बाकी का काम नेटवर्क पर ऑनलाइन किया जा रहा है। आजकल रुपयों का काम लेन-देन का हिसाब किताब सारा ऑनलाइन सिस्टम से हो रहा है। हम लोग अभी भी बेवकूफी की .तरह कतारों में खड़े हैं ,क्योंकि हमारे पास शिक्षा नहीं है। हमने शिक्षा को गहराई से समझा भी नहीं है अगर शिक्षा की अहमियत मालूम होती तो हम आज तक पिछड़े हुए नहीं रहते ।इस मैसेज से मैं यह आप सब को पैगाम देना चाहता हूं कई हमें हमारे घर में कोई भी छोटा मोटा प्रोग्राम हो हमें सोच समझकर खर्च करना होगा ।ताकि उनसे हमारा रुपया सही जगह लग जाए और बचे हुए रुपए हम अपने बच्चों के पालन पोषण और तालीम पर खर्च कर सकें जिसे समाज के नए हीरे बन सके और और वही देश और समाज का नाम रोशन कर सकें।
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